
शाक्य वंश राजघराने, प्रगट भये सिद्धार्थ।
माता महामाया देवी, पिता शुद्धोधन आर्य ।।1।।
महामाया सतलोक गई, गौतमी किया पालन।
विद्याओं से निपुण हुए,जीवन बना सदाचरण।।2।।
भविष्यवक्ता अजीत मुनि से, राजा हुए भयभीत।
कपिलवस्तु में वस्तु बिछा दी, भोगों के अगणित।।3।।
यौवन की परिपक्वता में ,यशोधरा से हुई सगाई।
महाराज हुए प्रसन्न,राजभवन में बजी शहनाई।।4।।
गृहस्थ जीवन निभाया,पुत्र हुए राहुल ।
पत्नी बच्चे राजमहल, लगे उन्हें प्रतिकूल ।।5।।
रोगी वृद्ध मुर्दा देखा, हुए प्रज्ञा चक्षु ।
संसारिता त्याग कर,सिद्धार्थ हुए भिक्षु।।6।।
अलारकलाम गुरु मिले, साधना किया पूर्ण।
बोधि वृक्ष की छाया में,बोध पाया संपूर्ण।।7।।
सारनाथ कुसिनारा, श्रावस्ती किया विहार। सदाचरण सद्विचार, मानवता का व्यवहार।।8।।
दुख निरोध अष्टांगिक, मार्ग का उपदेश दिया।
त्याग वैराग्य करुणामय, जीवन सुख से जिया।।9।।
कुसिनारा गोरखपुर में, त्याग किया महाप्राण।
अस्सी बरस की उम्र में, पाया पद निर्वाण।।10।।
कीचड़ में कमलवत, अपने को किया शुद्ध। दिनेंद्र तुझे नमन है, लाइट ऑफ एशिया बुद्ध।।11।।
रचयिता
दिनेंद्र दास
कबीर आश्रम करहीभदर
अध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद् तहसील ईकाई बालोद, जिला- बालोद (छत्तीसगढ़)
मो.नं. 85648 86665
