बेटा मेरा गया है फ़ौज में
देशभक्ति लिए अपनी सोच में ,
कुछ वतन का फर्ज़
कुछ मिट्टी का कर्ज़
मस्तमौला वो
अपनी ही मौज में ,,
बेटा मेरा गया फ़ौज में,,
देश भक्ति लिए अपनी सोच में,,
क्या पता कब वो वापस आएगा
कितनी छुट्टी मिलेगी इस बार उसको ,
मां बाप को साथ घुमाएगा
भरपूर मिलेगा बहन का प्यार उसको ,,
वो निकला है
सुरक्षित भारत की ख़ोज में ,
बेटा मेरा गया है फ़ौज में
देश भक्ति लिए अपनी सोच में,,
हर बार डाकिया आता है
उनकी लिखी चिट्ठी लाता है
इस बार भी वही हुआ
कैंसल उसका छुट्टी हुआ ,,
अभी वो न घर आ पायेगा
कल बड़े फजर दुश्मन से लड़ने जायेगा ,,
मन उसका खुश हैं
तन भी पूरे जोश में ,,
बेटा मेरा गया है फ़ौज में
देश भक्ति लिए अपनी सोच में,,
इस बार
डाकिया नही आया
न कोई खत आई
न कोई चिट्ठी लाया ,,
कुछ दिनों बाद
कुछ सेना के जवान आए
गांव सजाया
राह सजाए ,,
फिर एक ताबूत निकला गाड़ी से
तिरंगे में लिपटे शहीदी सवारी से
वो पार्थिव देह मेरा लाल था
देख जिसे मां का बुरा हाल था
रोती बहन बिलखती मां
मंजर वो विकराल था ,,
आज मैंने अपना बेटा दिया वतन को
समा गया जो इस तिरंगे की आगोश में ,,
बेटा मेरा गया था फ़ौज में
देश भक्ति लिए सोच में।
लेखक/कवि – लोकेश वैष्णव (कलमकार)
( छुरा नगर)
