कुछ राह चले हैं मैंने
कुछ चलना
अभी बाक़ी है ,
मैं एक राहगीर हूं
अभी
मेरा सफ़र जारी है,,
कभी ढलती शाम कहीं
तो कहीं
सुबह की लाली है
हर रोज़ उम्मीद की किरण लिए
अभी कुछ
भटकना बाकी है
मैं एक राहगीर हूं
अभी
मेरा सफ़र जारी है,,
अभी कुछ करना है
कुछ
कर गुजरना हैं
ये अरमान दिल मे जगाए रखना है
मतलबी दुनिया में
सब अपने हैं
ये भरम भारी हैं
मैं एक राहगीर हूं
मेरा
सफ़र अभी जारी है,,
खैर खबर तब तक
जब तक स्वार्थ हैं
कहां भावना अब
निस्वार्थ है ,
स्वार्थ की दुनियां में
यही दुनियादारी है ,,
मैं एक राहगीर हूं
मेरा
सफ़र अभी जारी है,,
लोकेश वैष्णव (कलमकार)
छुरा नगर
