जंगल……

अपनी जरूरतों के लिए

तूने मुझे टुकड़ों में बांट दिया

मेरी हरियाली को तबाह कर

        तुमने मुझे काट दिया,,

मैंने तो तुझे हमेशा देना चाहा

  मीठे फल दिए शीतल छांव दिया ,

पर तुम बन के हैवान

      मुझे बंजर घाव दिया ,,

मिट्टी सड़ाई पानी भी दूषित किया

           मुझे न पालन पोषित किया ,,

फिर भी मुझ पर हक जताता है

    अपनी हर जरूरत पे मुझे काटता जाता है,,

जंगल काट कर बंजर बनाया

   फिर उसने अपना शहर बसाया,

 जानवरो से उनका आवास छीना

      वन उजाड़ उनका रहवास छीना,,

तरह तरह के फर्नीचर से

   तुमने अपने घर को सजाया ,

कुर्सी टेबल सोफ़ा जैसे

   मेरे टुकड़ों से तुमने इसे बनाया ,,

क्या तारीफ़ करूं तेरी मूर्खता पर

   जंगल काट घर पर गार्डन लगाया ,,

अभी भी वक्त हैं सुधर जाओ

      जितना हो सके पेड़ लगाओ ,

वरना धरती इस से भी ज्यादा जलेगी

    42डिग्री से 52 होते देर न लगेगी ,,

फिर न तुम बचोगे

     न तुम्हारा अतीत होगा ,

तुम सब संभाल जाओ

       नही तो ये निश्चित होगा ,,

मै भी बारिश तभी करा पाऊंगा

               जब मैं घना हो जाऊंगा ,,

ज्यादा तुमसे कुछ नहीं मांग रहा

सब मिल के ठान लो,

चार चार पौधे लगाओ

  उसे बढ़ाना है सब जान लो,,

वृक्ष कितने उपयोगी है

          तुम तो जानो ,

वनों की जरूरत को तो

              तुम पहचानो,

लेखक – लोकेश वैष्णव (कलमकार)

                    छुरा नगर