सुख मिलथे—


कोनो कहिथे सुख मिले,मोटर बंगला कार म|
कोनों कहे सुख मिले,नौकरी अऊ व्यापार म||

कंजूस कहे सुख मिलथे,धन,दौलत नोट म|
नेता कहिथे सुख मिलथे,जनता के वोट म||
परोसी कहे सुख मिलथे,चारी चुगरी गोठ म|
कपटी ल सुख मिले,पीठ पाछु मारे चोट म||
सुख के कई पैमाना हे,अपन अपन विचार म-

कोनो ल सुख मिलथे,जवानी के रंग रूप म|
कोनो ल सुख मिलथे,अग्घन पुस के धूप म ||
कोनो ल सुख मिलथे,जिनगी के दौड़ धूप म|
कोनो ल गोठियाय म,त कोनो ल चुप चुप म||
सुख मिलथे आपस के,मया अऊ दुलार म–

कोनो ल सुख मिलथे,सतसंग के गोठ बात म|
कोनो ल सुख मिलथे,अपन गदही के लात म||
कोनो ल सुख मिलथे,फोकटईया दार भात म|
कोनो ल सुख मिले,मयारूक ले मुलाकात म||
सुख बारी नइ उपजे,न बेचावे हाट बाजार म-

कोनो ल सुख मिलथे,सोन कस अपन चाम म|
कोनो ल सुख मिलथे,फकत अपनेच काम म||
कोनो ल सुख मिलथे,पद,पइसा अऊ नाम म||
फेर सच्चा सुख मिलथे,कहे बर राम-राम म||

सुख के बारे म आपके,बतावव का विचार हे–
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार,राजिम,गरियाबंद(छ.ग.)