रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भाई-बहन के स्नेहिल प्रेम।

स्नेहिल  प्रेम

नेहा के जिद्द ने रामसाय को झुका दिया। उनकी अकड़ ढीली हो गई। पत्नी सुलोचना भी बार-बार यही कह रही थी कि एक बार जाकर तो देखो वे लोग जाग रहे होंगे। रात्रि के करीब 10 बज गए थे रामसाय पूरी तरह घबराया हुआ था कि उनके घर में कौन सा मुंह लेकर जाऊं। मन में तो कालीक भरा हुआ है उसे हिम्मत नहीं हो रही थी कि पता नहीं वह क्या कर देंगे। वे अनमने मन घर से बाहर निकाला और उनके घर के दरवाजे तक पहुंच गया और 1 मिनट तक लंबी सांस ली फिर साहस बटोरकर दरवाजा खटखटाया खट …खट…! की आवाजें सुनकर सोनसाय अंदर से आवाज दिया कौन है? इतनी रात कैसे ?”
रामसाय बोला, “मैं…. मैं…. !” उसे पूरा भय सवार था कि मेरा नाम सुनते ही दरवाजा नहीं खोलेंगे।
” कौन है ? कौन…? पूरा नाम साफ-साफ क्यों नहीं बताते।” कहते हुए सोनसाय ने दरवाजा खोला तो रामसाय को सामने देखकर आग बबूला हो गया ,समझा कि यह तो मुझे मारने आया है वह सावधान हो गया और पास में रखी हुई लाठी उठा ली और तेज स्वर में बोला, “तुम्हें यहां देर रात आने की हिम्मत कैसे हुई? तुम मेरे सबसे बड़े शत्रु हो…! दुश्मन हो…! ” रामसाय सीधे सोनसाय के चरणों में गिर पड़ा। उनके नेत्रों से अश्रु की धारा बहने लगी वह रोते हुए बोला, “भैया! आप मुझे मारे चाहे बचाये मैं आपके सामने हूं। परंतु एक बात मेरी सुन लीजिए मेरी बेटी नेहा को…! नेहा… को…!”
बीच में बात काटते हुए सोनसाय ने अपने छोटे भाई से कहा, “क्या हुआ नेहा को…! नेहा ठीक तो हैं …!”
” बस, एक बार नेहा को विशाल से मिलवा दीजिए ।सब ठीक हो जाएगा । ”
कुछ समय पहले ही बिस्तर पर छटपटाते हुए विशाल का दिल यही कह रहा था कि मेरे बाप ने मेरा नाम विशाल जरूर रखा है पर अपना हृदय विशाल नहीं बना पाए ।आज भी वे संकुचित विचार रखते हैं।
रामसाय की बात सुनकर सोनसाय की मस्तिष्क पर चढ़ी त्योंरी डाउन हो गई। उनके अंतरंग में हुआ कि अभी मैं नाहक ही अपने छोटे भाई को मार डालता। उनके हाथ की लाठी ऐसी छूटी जैसे हाथ से तिनका। वह असमंजस में पड़ गया। तभी सोनसाय की आवाज सुनकर पत्नी शकुंतला घर से बाहर निकली और बोली, “आज विशाल का भी यही हाल है वह दिनभर उदास घर में पड़ा है। वह क्रिकेट खेलने तक नहीं गया कुछ खाया पिया भी नहीं ।सुबह से अभी तक नेहा…!नेहा….! का नाम जप रहा है। अभी भी आंसू बहते बेड पर पड़ा हुआ है । सयानो की दुश्मनी का अभिशाप इन बच्चों को क्यों दें। हम बच्चों के स्नेहल प्रेम को कुचलना चाहते हैं खिले हुए फूलों को मुरझा देना चाहते हैं यह हमारी सबसे बड़ी कमी है। शकुंतला हिम्मत की और स्वयं रामसाय से बोली,” भाई साहब !आप घर जाकर नेहा बेटी को ले आइए।”
जी भाभी जी! कहते हुए रामसाय आंसू पोंछते हुए घर चला गया।
रामसाय और सोनसाय दोनों भाई लंगोटिया यार जैसे रहते थे। घर से बाहर कहीं भी जाते तो दो चेहरे होते थे। एक दूसरे के बिना एक पल भी रह नहीं पाते थे। अमन चैन की जिंदगी बीत रही थी। बहूएं में कोई मनमुटाव ना था। दिन बीतते गए भाइयों में कुछ बातों को लेकर खटास पैदा हो गई बात बढ़ती गई और कुछ ही दिनों में जमीन, जायदाद, दुकान और मकान मेरी- तेरी की भावना में बदल गई और सब कुछ तो टुकड़े हैं हो गए। दो हंडिया चढ़ने लगी इसके बावजूद भी किसी को संतुष्टि नहीं थी। छोटी-छोटी बातों को वे तिल का ताड़ बनाने लग जाते थे । दोनों मैं … मैं…। इतनी बढ़ गई थी कि एक दूसरे खून के प्यासे हो गए। एक दूसरे की परछाई देखना पाप समझते थे। ऐसे कटा-कटी दुश्मनी वर्षों से चल रही थी। किसी को चैन नहीं तू डाल-डाल तो मैं पात-पात की भावना दोनों में कूट-कूट कर भरी हुई थी । सोनसाय कहता था। भले ही कांटे आम में मौर आ जाए और फाटे कान जुड़ जाए पर मैं अपने भाई के साथ इस जन्म में जुड़ नहीं सकता।
बड़े भाई सोनसाय का इकलौता सुपुत्र विशाल था और छोटे भाई रामसाय की एक ही सुपुत्री नेहा थी जो विशाल से उम्र में एक वर्ष छोटी थी। बचपन में दोनों बच्चे एक थाली में खाते थे। साथ-साथ खेले- कूदे, लड़े- झगड़े पर दोनों में प्रगाढ़ स्नेह था। एक दूसरे के बिना नहीं रह नहीं पाते थे। भाइयों में बंटवारा होने के बाद वे लोग विशाल और नेहा के दिलों को भी बांटना चाहते थे इसलिए दोनों के मां-बाप उन्हें एक दूसरे से मिलने पर प्रतिबंध लगा दिए थे। परंतु दोनों के हृदय स्पर्शी स्नेहिल प्रेम के आगे मां-बाप की फटकार उन्हें टिका नहीं पाए। एक ही स्कूल में पढ़ने की वजह से दोनों का मिलन आसान था ।सावन की पूर्णिमा रात में हल्की बारिश हो रही थी आकाश में काली घटा छाई हुई थी। वैसे ही नेहा के मन में उदासी छाई हुई थी ।वह बिस्तर पर बदवाश जैसी पड़ी थी। मानो कई दिनों से उपवास हो और शरीर जीर्ण हो।परंतु बीच-बीच में उनके अंत: पटल पर एक ही बात उभर कर सामने आ रही थी कि पिताजी एवं बड़े पिताजी को हो क्या गया है उन्हें लड़ाई में ही आनंद आता है उसे यही तो मिलता है द्वैष, ईर्ष्या, घृणा एवं नफरत की आग में रात- दिन जलते रहना। अपने जीवन को कंटकाकीर्ण बनाए रखना। मानो दोनों की यही नियति हो गई है ।शांति से जीना चाहते ही नहीं । इन्हें कौन समझाए अपने-अपने अहंकार ( एगो) की वजह से एक दूसरे के सामने झुकना ही नहीं चाहते हैं। नेहा सो रही थी तभी उनके पिता ने नेहा के सर पर हाथ रखते हुए कहा,” बेटी, तुम विशाल से मिलना चाहती हो ना…! तो जल्दी तैयार हो जाओ विशाल के यहां चलना है।” नेहा तो यही शब्द सुनने के लिए तरस रही थी। उनका मन गदगद हो गया वह भूल ही गई कि आज सुबह घर से बाहर जाते देखकर पिता ने मुझे खूब डाटा था कि तुम दुश्मन के घर नहीं जाओगे। भाई दुश्मन है तो भतीजा भी दुश्मन हुए। पिता के डांट फटकार से नेहा दिनभर मानसिक पीड़ा से पीड़ित थी। वह विशाल का नाम सुनते ही झटपट पलंग से उठ खड़ी हुई और पूजा सामग्री की तैयारी करने लगी नए कपड़े पहने और अपने मां- बाप के साथ चल पड़ी विशाल के घर की ओर। विशाल के घर के लोग भी रास्ते जोह रहे थे। विशाल के घर तीनों के प्रवेश करते ही मानो वहां की बुझी हुई बत्ती पुनः जल गई उठी सबके हृदय के अंदर का अहंकार छटकर प्रकाश में बदल गया और एक बार सबके चेहरे खिल गए होठों में मुस्कुराहट आ गई ऐसा लग रहा था कि मानो सबको अपनी खोई हुई दौलत मिल गई हो। नेहा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सामने सोफा पर बैठा विशाल भी मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। सबके मन अह्लादित थे। आज वर्षों बाद भाई बहन का स्नेहिल प्रेम ने परिवार के नफरत को प्यार में बदल दिया। नेहा सर्वप्रथम अपने बड़े भाई विशाल के चरण पखारे, चरणामृत लिए, मस्तक पर तिलक लगाये, फूल- माला पहनाई फिर विशाल के वर्षों से सूनी पड़ी कलाई पर राखी बांधी और उनकी आरती उतारी तत्पश्चात अपने हाथ से मिठाई खिलाई विशाल ने भी अपनी बहन नेहा का मुंह मीठा किया और कपड़े एवं रुपए भेट दी फिर बोला, “मेरी बहन नेहा मैं जीवन भर तुम्हारी रक्षा करूंगा। तुम्हारी खुशी हमारी खुशी होगी रामसाय एवं सोनसाय दोनों भाइयों की अश्रु धारा के साथ 15 साल पुरानी दुश्मनी बह गई और सबके हृदय में प्रेम एवं करुणा की तरंगें उठने लगी देवरानी जेठानी भी वर्षों के द्वैष को दफनाकर प्यार से गले मिले। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भाई-बहन के स्नेहिल प्रेम ने अपने-अपने मां-बाप को मिला दिया।

कहानीकार
दिनेंद्र दास
कबीरआश्रम करहीभदर
अध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद बालोद
जिला- बालोद
छत्तीसगढ़
मो. 8564886665