तोर अगोरा—

तोर अगोरा—
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वादा करे रेहेस कारी,आहूं जी मेंहा अषाढ़ में|
सतरंगी चुनरी ओढ़े,करिया बादर के आड़ में||

फुरुर फुरुर पुरवाहि बन,तोरेच घर अंगना आहूं|
कोयली बन तोला,निशदिन राग मल्हार सुनाहूं||
पगली आँधी बन मेंहा,डोलत रहूँ बोइर झाड़ में–

छिन म मुसलाधार बरसहूँ,कभु रिमझिम गिरहूं|
खेत खार म काम करत,तोर आघु पीछु फिरहूं||
नंगत ले तोला भिंजोहूं,मैं,अपन मया के बाढ़ में–

इंद्रधनुष बनके आहूं,तोर जिवरा ल में धड़काहूं|
कभु आ जहूं बिहनिया,कभु अधरतिहा म आहूं||
मोर रूप ल देखते रहिबे,जंगल अऊ पहाड़ में—

अपनेच करे वादा ल,तै काबर नइ निभावत हस|
का होगे कारी बरखा,काबर मोला तरसावत हस||
तोर अगोरा आँखी थक गे,पीरा भरगे रे हाड़ म–

रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार राजिम, गरियाबंद,(छ. ग.)