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एक झन लइका कहीथे भैय्या,
का सरग-नरक ह सच म होथे|
तै वोकर भेद बता दे मोला जी,
वोहा होथे त कइसन होथे||
मेंहा बात काहत हों सुन लो,
लोग लइका अऊ सियनहा|
सरग,नरक ह इंहीचे हावय,
वोकर हावय ग चार चिन्हा||
जेकर तीर सुग्घर काया हे,
धन,दौलत अऊ माया हे||
जे घर म सतवंतीन नारी हे,
जेकर लइका आज्ञाकारी हे|
उहिच्च घर ह सरग होथे–
जेकर तीर न सुग्घर काया हे,
धन,दौलत न कोनो माया हे||
जे घर म कुलक्षिणी नारी हे,
जेकर लइका अत्याचारी हे||
उहिच्च घर ह नरक होथे–
जे घर म दाई ददा अऊ गुरु के,
सुग्घर के मान करैय्या हे|
जेकर घर म सगा पहुना ल,
देवता समझ के पूजैइया हे||
वो घर ह हाँसत खेलत,
सरग के फुलवारी ये–
जे घर म अन्न अऊ गऊ के,
होथे निशदिन अपमान|
जेकर घर म बेटी बहिनी ल,
थोरको नइ मिले सम्मान||
सहिच काहत हों वो घर ह,
सौन्हत नरक के दुवारी ये—
अब बता दो कोन ल अपन,
जिनगी ल सरग बनाना हे|
या अब भी कीरा मकोरा जस,
जिनगी ल नरक बनाना हे||
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद
