नारी तुम शक्ति का हो दूजा नाम सहनशीलता हैं तुम्हारी बेमिसाल

विषय-नारी तुम शक्ति का दूजा नाम
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नारी तुम शक्ति का हो दूजा नाम
सहनशीलता हैं तुम्हारी बेमिसाल
तुम ही तो हो हौसलों की उड़ान
कभी कम न होगी तेरी ये शान।

दुष्टों के लिए तुम दहकती अंगार
आँखों में भरती दर्द का ही सैलाब
हर मुश्किल को करती हँसकर पार
तुममें ही समाहित सकल ये जहान।

अन्नपूर्णा कहलाती तू देवी साक्षात
हर शुभकर्म को देती सुंदर अंजाम
तुम हो काली चंडी व दुर्गा अवतार
माँ बहन व बेटी तू सृष्टि की श्रृंगार।

ब्रम्हांड के हर रहस्य का तुम्हें ज्ञान
प्रलय की गोद में करती आविष्कार
अनंत वेदना का नहीं करती बखान
ममता स्नेह व करुणा की तुम धार।

दया-धर्म त्याग व तपस्या की आधार
प्रेमधन बरसाती तुम ही लक्ष्मी समान
मंदिर में गुंजित मधुर सी शंखनाद
रोली चंदन से सज्जित पूजा की थाल।

माँ शारदा तुमसे होती वीणा झंकार
सरल-सहज व सौम्य रखती व्यवहार
प्रीत की रीत निभाती जननी हो महान
परिवार का हर पल तुम रखती ध्यान।

नवयुग की तुम आह्वान तुमसे विश्वास
तुम ही तो ऋषि-मुनियों कीे उद्गार
हृदय में रहती बनकर मीठा एहसास
हर अतृप्त मन की बुझाती प्यास।।
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प्रेषक,
कवयित्री
सरोज कंसारी
नवापारा राजिम
जिला-रायपुर(छ.ग.)