कुण्ठाओं की गांठें तोड़ो, मन में कभी न बांधो।

शीर्षक- गाँठ
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कुण्ठाओं की गांठें तोड़ो,
मन में कभी न बांधो।
सही बात स्पष्ट कहो नित,
जीवन अपना साधो।।
झूठी क़समों और वादों के,
चक्कर में मत पड़िये।
कभी न मन में गांठ बांधकर,
लड़िये और झगड़िये।।
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उर में सात्विक भाव रखो नित ,
मन को शुद्ध बनाओ।
नेक राह पर चलो हमेशा,
दया-धर्म अपनाओ।।
फ़र्ज़ निभाते रहो सदा ही,
समझो जिम्मेदारी।
बिना वजह ना बात बढ़ाओ,
बनिये सद्व्यवहारी।।
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सदा थाम कर रखो करों में,
उम्मीदों का दामन।
हिम्मत को हथियार बनाओ,
श्रम बन जाये साधन।।
श्रम से नहीं चुराओ जी को,
संकल्पों को धारो।
बोझ बनो ना कभी किसी पर,
अपना क़र्ज़ उतारो।।
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हटा उदासी निज चेहरे से,
सदा रहो मुस्काते।
जो संकल्पों से जीते हैं,
वे ही मंज़िल पाते।।
रहें ख़्वाहिशें नहीं अधूरी,
यत्नों से हों पूरी ।
दुनियादारी के झंझट से,
सदा बना लो दूरी।।
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करो आत्मचिंतन निज मन में,
तुम कमजोर बनो मत।
पकड़े रहो सदा मंज़िल को,
कोई छोर तजो मत।।
सदा इस की लौ को रखिये,
उर में सदा जलाकर।
ध्येय एक दिन पा जाओगे,
जग में कष्ट उठाकर।।
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कष्टों से अपने जीवन में,
कभी नहीं घबराओ।
यह सब तो विधि का विधान है,
मन को यों समझाओ।।
संघर्षों के लिए यहां पर,
यदि तैयार रहोगे।
तो जीवन में सफल रहोगे,
नित जयमाल वरोगे।।
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जन्म -मृत्यु का चक्र सदा ही,
चलता है इस जग में।
कर्मव्रती नर धैर्य त्यागकर,
कभी न रुकता मग में।।
क्षणभंगुर है सबका जीवन,
इस धरती पर जानो।
ख़ुद को भी तुम अतिथि धरा पर,
अल्प समय का जानो।।
नित कर्मों में लीन रहो तुम,
गीत सृजन के गाओ।
कभी न अनबन रहे किसी से,
सामंजस्य बिठाओ।।
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नफ़रत के बारे में जीना,
अच्छी बात नहीं है।
धोखा देने से बढ़कर के,
कोई घात नहीं है ।।
बांटो सबको ही अपनापन,
प्यार सभी का पाओ।
नित *सरोज* की भांति जगत में,
सबको सुरभि लुटाओ।।
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प्रेषक,
कवयित्री
सरोज कंसारी
नवापारा राजिम
जिला-रायपुर(छ.ग.)