अक्षय फल के दाता अक्षय तृतीया परब

अक्षय तृतीया” नाम से ही स्पस्ट हे।जेकर कोनो काल युग में कभी क्षय नई होय।अक्षय तृतीया के अपन एक अलग महत्व हे।जे तिथि म हमर हिंदु मन के पूरा धार्मिक,सामाजिक,पौराणिक,पारम्परिक कारज हर बिना कोनो बिघ्न-बाधा के सम्पन्न हो जाथे।

अक्षय तृतीया अपन आप म अद्वितीय अउ स्वयं सिद्ध हे।ए तिथि म कोनो भी कारज करे म दिन,तिथि,लगन,घड़ी,पत्रा-पंचांग देखे के आवश्यकता नई पड़य। ए हर अपन आप म सिद्ध ही हावय।

अक्षय तृतीया के ए पावन दिवस हर बैसाख मास के शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि म मनाय जाथे।धर्मग्रन्थ पुराण के अनुसार ए दिन जो भी शुभ कारज करे जाथे ओकर अक्षय फल मिलथे। अउ ए कारण से एला “अक्षय तृतीया” के नाम से जाने जाथे।अईसे माने जाथे कि ए पर्व हर शुक्ल पक्ष के तृतीया म होथे त एला अत्यंत शुभ माने जाथे।

अक्षय तृतीया चूंकि अपन आप म स्वयं सिद्ध होथे, इही कारण ए दिन ल “सर्व सिद्ध मुहूर्त” के रूप म भी मनाय जाथे।

ए कारण से ए तिथि के हमर हिंदु मन ल

विशेष प्रतीक्षा रहिथे। अउ बिना कोनो पत्रा-पंचांग देखे शुभ कारज ल सम्पन्न करे जाथे।जेमा मांगलिक कारज विवाह सहित गृह-प्रवेश नवा-नवा वस्त्र-आभूषण के खूब खरीददारी आदि होथे।

हमर धर्म ग्रन्थ म अईसे उल्लेख हावय कि इही दिन पितर मन ल तर्पण,पिंडदान या फिर कोनो प्रकार के करे गय दान आदि के अक्षय फल के प्राप्ति होथे। तभे तो उल्लेख भी हावय-

“अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥

उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः।तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥”

ए दिन गंगा में स्नान-ध्यान,भगवत भजन करे से जन्म-जन्मांतर के जम्मो पाप हर धुल जाथे। अउ सच्चा मन से यदि भगवान से प्रार्थना करे जाए त ओ जम्मो अपराध ल क्षमा कर देथे।एकरे कारण ए परम्परा हे कि जनमानस अपन लिए मंगलकामना के प्रार्थना करथे।

अक्षय तृतीया ल वसन्त ऋतु के समापन अउ ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ काल भी माने जाथे।ए करण जल से भरे घड़ा,पंखा,छाता,शक्कर,इमली,सत्तू,आदि जेकर से गर्मी से राहत मिलथे ओ सब के दान करे जाथे।अउ माने जाथे कि जो वस्तु दान म दिए जाथे ओ सब हर अगला जन्म म प्राप्त होथे।

अक्षय तृतीया के धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्व हावय।ए तिथि ल सतयुग अउ त्रेतायुग के आरम्भ काल,भगवान विष्णु के नर अवतार अउ हयग्रीव,परशुराम,ब्रम्हापुत्र अक्षय कुमार,गङ्गा मईया,अन्नपुर्णा मईया का अवतरण दिवस भी माने जाथे।इही दिन द्रौपदी चीरहरण,कृष्ण सुदामा के मिलन,अउ कुबेर के खजाना भी मिले रिहिस।अउ इही दिन प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी खुलथे। इही दिन वृंदावन म श्री बाँके-बिहारी के श्री विग्रह के दर्शन भी हो पाथे।इही दिन महाभारत के युद्ध भी समाप्त होय रिहिस।

अक्षय तृतीया के सामाजिक अउ सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष महत्व हावय।ए दिन शादी-व्याह लगन के मांगलिक कारज भी सम्पन्न करे जाथे।पुतरी-पुतरा के विवाह पूरा रीति-रिवाज के साथ सम्पन्न करे जाथे,ताकि आने वाला नवा पीढ़ी हर सामाजिक परम्परा,रस्मो-रिवाज,के व्यवहारिकता ल सीख सकें,जान सके।इही अक्षय तृतीया के दिन किसान भाई मन एकत्रित होके अपन अपन ग्राम के देवी-देवता,कुल देवता से मंगल प्रार्थना अउ अच्छा फसल उपज के कामना करथें।बीज के मंत्रोंपचार करके खेत म बीजारोपण के शुरुवात करथें।जेला छत्तीसगढ़ में बीजारोपण या “मूंठ लेना” कहे जाथे।ए प्रकार से यह कहे जा सकत हे कि अक्षय तृतीया के अपन सांस्कृतिक, सामाजिक,धार्मिक,अउ पौराणिक महत्व तो हे। एकर अलावा हमर सांस्कृतिक विरासत ल सहेज के भी रखे हावय।अउ हमर शुभ कारज ल करे के सुग्हर मुहूर्त भी प्रदान करथे।