पढ़िए प्रिया की लिखी कविता, “बढ़ती जाती है मँहगाई”…
महँगाई बढ़ती जाती है मँहगाई। घर घर होती है तंगाई।। सोच समझ कर आगे बढ़ते। मँहगाई से जन जन डरते।। आसमान को छूती जाती। धरती पर वह अब ना आती।। देख रहे हैं लोग तमाशा। लेकर के जीवन मे आशा।। दाम सभी का बढ़ता जाता। मँहगाई नीचे ना आता।। सस्ते सस्ते आलू केले। भाव बढ़े…
