“पताल चोट्टा “[छत्तीसगढ़ी कहानी]

“पताल चोट्टा “[छत्तीसगढ़ी कहानी]
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आज बड़े बिहनिया ले गाँव के हरेक चौपाल म,आरा-पारा म,खेत खार,अऊ तरिया नरवा म इही गोठ ह आवत जावत रहे कि, मास्टर समेलाल के घर म चोरी होगे हे कहिके,अब आप मन ये झन सोचहू कि समेलाल ह कोनो स्कूल के गुरुजी हरे कहिके, अरे भई वोहा तो कुरता,सलुखा सिलइया छोटकुन कारीगर हरे,कोनो जमाना म वोकर कला के भारी मान रिहिस हे फेर का कहिबे जब ले जींस के उठुवा कुरता अऊ डुठुवा पैंट के चलन शुरू होईस हे तबले वोकर जिनगी ह ले दे के चलत हे, परिवार चलाय बर रोज शहर जाके एक ठिन दुकान म कारीगरी करथे|
अऊ इहिच बात ह बड़ अचरज के बात होगे कि अइसन लिल्हर मनखे के घर आखिर चोरहा मन ल का मिल जहि, खैर जइसे भी हो चोरी ह तो होगे न,मनखे मन अपन-अपन गुनान गोठ करत रिहिस,इही बीच म कोटवार ह हाँका पारिस कि आज संझौती के बेरा राम लीला के चौरा म बईठका म जुरियाना हे कहिके|सब ल समझत देरी नी लगिस कि ये बईठका ल मास्टर समेलाल ह बुलाय होहि कहिके|
संझाकुन सब मनखे अऊ गांव के सरपंच,पंच,गांव के मुखिया ह जुरियागे,तब फेर मुखिया ह मास्टर समेलाल ल पूछीस,कस जी मास्टर तोर घर म का-का जिनिस के चोरी होगे,अऊ तोला काकर उपर शक सुबा हे जी,अतका ल सुनके, मास्टर ह संकोच भाव ले कहीथे कि मैं का बतावं मोर घर म का चीज के चोरी होय हावय तेन ल,मोर मरहा खुरहा घर का चीज रही,फेर एक्के ठिन चीज के चोरी होय हावय,अब आप मन ल का बतांव |, वोकर बात पूरा होय के पहिली सरपंच ह कहीथे,, बता न जी बने फोर के बता का चोरी होय हे तेन ल,, अतका ल सुन के मास्टर समेलाल ह कहीथे,मोर घर ले एक किलो पताल के चोरी होगे हे भाई हो,,वो चोरहा मन ह मोर घर ले पताल चोराय हे|
समेलाल के गोठ ल सुन के सब मनखे मन खलखला के हाँस डरीन,मनखे मन ल अईसेे लागत रिहिस कि मास्टर ह मजाक करत हे,फेर समेलाल के ये गोठ ह मुखिया ल नी सुहाइस,वोहा जोरदरहा कड़क आवाज म कहिस, अरे!समेलाल, तै हमन ल मुरुख समझे हस का?कोनो मनखे ह घर भीतरी के पताल ल चोराही,,, अऊ तै ये बता,आज बड़े-बड़े मनखे मन ह पाव भर पताल ल महंगाई के मारे खरीद नी सकत हे,अऊ तेहा दु सौ रुपया किलो के पताल ल खरीदे रेहे हस,अरे!सुन तै तो गांव भर ले मंडल होगेस रे,तोला पता हे तोर औकात कतका हे तेन ह?मुखिया के गोठ सुन जुरियाए मनखे मन वोला ताना मार मार के हाँसत रहय|
दूसर डहर सब झन ल हाँसत देख के मास्टर समेलाल गोहार पार के रोए ल धर लिस,अऊ रोवत-रोवत कहिस,बने हाँस लो भाई हो,जेकर औकात नी रहे न वोकर उपर सब हांसथे, मास्टर समेलाल रोवत-रोवत सरलगहा कहिस कि,आप मन बने कहत हो मुखिया जी मोर कोनो औकात नी हे, फेर का करबे महू ह एक झन बेटी बियाय हों,जेकर ससुर ह दु दिन अकता गे खबर करे हे कि, मेंहा इतवार के आवत हों, बने बेवस्था करे रहीबे कही के, उपर से बेटी ह घलक फोन करे रिहिस कि, बाबू मोर ससुर के बने पहुनाइ करबे कही के,,, मोर कुछु औकात नी हे रे भाई हो, फेर मोर बेटी के मान सम्मान के खातिर वोकर ससुर के पहुनाइ करे बर एक किलो चना पिसान अऊ एक किलो पताल खरीद के लाय रेहे हों,, वहू ल चोरहा साले “पताल चोट्टा” मन के आँखी फूट गे, अब अपन कामा कइसे करहू, अपन बेटी के इज्जत कइसे बचावंव, ये कहि कहि के मास्टर समेलाल बम फाड़ के रोय ल धरलिस|
मास्टर के करलई ल देख सुन के सब के हिरदे ह पिघलगे,अऊ वो “पताल चोट्टा” मन बर सबके जी खिसियागे,तेकर पाछु सरपंच ह सब झन ल कहीथे कि, जब तक वो चोरहा मन ल पकड़ नी लेबो, तब तक हमन अन जल ग्रहण नी करन, ये कहि के गांव के चारो मुडा म दस-दस,बीस-बीस के टोली म सब झन ह निकलगे,खोजत खोजत गांव के बुड़ती खार म सरपंच ह दु झन मनखे ल देखिस त, का देखथे वो मन ह दारू कुकरी के पार्टी करत राहे, संग म एक कड़ाही पताल के रसदार चटनी बनाय राहे, लोगन ल समझत देरी नी लगिस कि मास्टर घर के पताल ल इही मन ह चोराय हे|
दुनो झन “पताल चोट्टा” ल पकड़ के पूछीन,त शुरु म वोमन येति वोति के बात करिस,फेर जब गांव वाला मन ह पुलिस अऊ जेल भेजे के दबाव बनाइस त वोमन अपन गलती ल स्वीकार करिस,अऊ बाते बात म बताइस कि हमन ह बड़े घर के लइका जरूर हरन फेर जुआ, सट्टा, पब्जी खेलई, अऊ गान्जा, दारू के नशा के चलत पइसा के खातिर ये काम ल करे हन,वोमन ह बताइस कि आज बासिन बजार म मास्टर ल एक किलो पताल लेवत देखे हन त हमन ल अइसन लागिस कि, आज भरे महंगाई म बड़े बड़े मनखे के हालत पस्त हे अऊ ये मास्टर ह एक किलो पताल लेवत हे, त हो न हो ये कोई माल दार आदमी हरे, जरूर येकर घर म हंडा गड़े होहि, इही लालच म मास्टर के घर चल देन, रात भर खोजेन, आखिर म कुछु नी मिलिस त इही पताल ल धर के भागे हन, अऊ “पताल चोट्टा “बनगेन|
अतका ल सुन के गांव के जम्मो पंच,सरपंच अऊ मुखिया ह दुनो “पताल चोट्टा” ल जम के लतेडीन, अऊ वोकर सजा सुनावत कहीन कि,हमन चाहबो ते तुमन ल जेल भेज सकत हन, फेर तहू मन ह गांव के बिगड़े लइका हरो, अऊ एला सुधारना हमी मन ल हावय ये सेती,तुमन ह दूनों झन अपन बाड़ी म पताल लगाके वोकर देख रेख करो अऊ जब पताल ह फर के पाक जहि त मास्टर समेलाल ल चोराय पताल के बदला म जुरमाना के रूप म पांच किलो पताल दे बर लागहि,याद रहे वो बाड़ी म मेहनत तुही मन ल करे ल पड़हि|
पंच परमेश्वर के फैसला सुन के दुनों चोरहा ह कलेचुप हामी भरीन, अऊ गांव के मुखिया ह मास्टर ल कहिस, तोर बेटी ह हमर बेटी ये, हमर बेटी के मान सम्मान हमर गांव के मान सम्मान ये, हम अपन पहूना ल देवता मान के पहुनाइ करबो, आप कुछु फिकर झन करो|
सगा आइस गिस होगे, अऊ वोति दुनो “पताल चोट्टा” मन ह रात दिन मेहनत करके मास्टर समेलाल के करजा ल तो छुटबे करिन, फेर खुदे समझदार नागरिक बन के अपन पांव म खड़ा होगे, फेर दुनो झन ल एकेच बात के जिनगी भर दुख रहे कि आज भी गांव के मनखे मन वो मन ल पीठ पाछु एकेच नाव धरथे,, “पताल चोट्टा”——-
रचनाकार:–श्रवण कुमार साहू” प्रखर “
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद (छ.ग.)