
” अप्पो दीपो भवः “
अपने हिस्से की लड़ाई,
खुद ही लड़ना पड़ता है|
एक बार को कौन कहे,
बार-बार मरना पड़ता है||
सत्य की तलाश हेतु,
सदैव बुद्ध बनना पड़ता है|
धर्म की जय-जयकार हेतु,
युद्ध लड़ना पड़ता है||
यह दुनियाँ एक कुरुक्षेत्र है,
कोई कौरव,कोई पांडव|
मौन तपस्वी चुप्पी साधे,
अधर्मी कर रहे तांडव||
तुझे बचाने के लिए कोई,
राम,कृष्ण नहीं आयेगा|
कपटी शकुनि की चालों से,
कोई कैसे बच पायेगा||
भस्मासुर बनें न कोई,
सावधान रहो अकलमंदों से|
चलो देश और धर्म बचायें,
उन छुपे हुए जयचंदों से||
अन्याय के दमन हेतु,
स्वमेव गांडीव और बाण बनो |
“अप्पो दीपो भवः”बनने,
श्रीकृष्णचंद्र भगवान बनो||
रचनाकार:–श्रवण कुमार साहू, ” प्रखर “
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद (छ.ग.)
