जीव में शिव l

जीव में शिव
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हरेक जीव में शिव समाया,
और शिव के अंदर हर जीव|
जो न समझे इस मर्म को,
उसको मानों तुम निर्जीव||

राम नाम के अमृत से,
जो भरा हुआ है आकंठ|
जग के सारे जहर पीकर,
वो कहलाते हैं नीलकंठ||

तन बाघम्वर,भभूत लगाए,
जो खाते हैं भांग का गोला|
अलख निरंजन औघडदानी,
कहलाते है वो शिव भोला||

जिनकी दया से कंटक पथ पर,
कभी गड़ते नहीं शूल, कंकड़||
जो पतझड़ में भी बहार ला दे,
बहुत अद्भुत है मेरो शंकर||

भक्त वत्सल,भगवान कृपालु,
जो नाथों के भी है नाथ|
देव,दनुज,असुर के भोले,
जो है भूतों के भूतनाथ||

राम नाम रटते रहते हैं,
कभी लेते नहीं विश्राम|
दोनों के अद्भुत प्रेम का,
साक्षी है रामेश्वर धाम||
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
(सावन के पावन महीने में शिव जी की कृपा,
आपके परिवार पर सदा बनी रहे,, बोल बम)