किरंदुल/ रणवीर सिंह चौहान
किरंदुल :- आये दिन समाचार पत्रों में प्रमुखता से इस विकराल समस्या की उठाया जाता रहा किन्तु कंपनी की हठधर्मिता व दादागिरी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है दिन ब दिन धूल व लौह चूर्ण के गुबार बढ़ते ही जा रहें हैं।

यहां तक कि पूर्व में जो थोड़ा बहुत पानी डाल परिवहन मार्ग को भिगो के रखा जाता अब वह भी बंद कर लोगों को धूल फांकने के लिए विवश कर दिया गया है, ठेकेदार व कंपनी के दलाल कंपनी के सहभागी बने हुए हैं, कंपनी की जिले मे उपस्थिति बहुत शीघ्र ही किरन्दुल व आसपास के क्षेत्र में गंभीर नतीजे व हालात पैदा कर देगी यह धूल व लौह चूर्ण के गुबार तो एक बानगी भर है असल हानि तो अप्रत्यक्ष है।
कंपनी सुकमा से होकर बहने वाली शबरी नदी से संयंत्र की आवश्यकता भर का कुल पानी प्राप्त करती है कंपनी विभिन्न प्रोसेस व केमिकल का उपयोग कर जिस मॉल को को पाइप लाइन माध्यम से किरंदुल से विशाखापत्तनम की ओर भेजती है अन्य परियोजना से लाए गई फाइन ओर को आर्सेलर मित्तल द्वारा बाल मील के अंदर डाल दिया जाता है।
एवं साथ में 60 एम एम, 40 एम एम वा 25 एम एम के बॉल के साथ ग्रैंडिंग मीडिया में डाल कर 4 प्रकार के केमिकल मिलाकर एक विशेष प्रकार की लुगदी में परिवर्तित कर पाइप लाइन से विशाखापत्तनम की ओर पानी की अति तीव्रता के साथ भेजा जाता है जिसे भेजने के लिए एक सेकेंड में 1699 लीटर पानी की आवस्यकता होती है,तो आप सहज यह अनुमान लगा सकतें हैं 24 घंटे रन करने आर्सेलर मित्तल के संयंत्र को रोजाना पानी की कितनी प्रचुर मात्रा की आवस्यकता पड़ती है ।
जहां लोगों को अपनी दैनिक आवश्यकता के पानी की कमी से जूझना होता हैं गर्मी के मौसम में और भी, वहीं कंपनी रोजाना करोड़ों लीटर बस्तर के लोगों के हक का पानी अपने ऐसे काम पर निपटा देती है जिसका लाभ न तो आदिवासियों को।है ना यहां की आम जनता को उन्हें तो केवल धूल खाने की नियति से दो चार होना है वा कम्पनी के झूठे वादों की धज्जियां उड़ती देखने की विवशता को झेलना ही उनकी नियति बन चुकी है।

स्थानीय विधा नगर पटेल पारा जहाँ स्कूल की संख्या ज्यादा है यहाँ के स्कूली बच्चों के आने जाने का एक मात्र साधन एक पुल है जो पूरी तरह से क्षतिग्रस्त व जर्जर हालत में है बच्चे उस पूल से आने जाने में खौफ खाने लगे हैं, इस पर भी इनका ध्यान नहीं जाता। मामला चाहे आर्सेलर मित्तल के गार्बेज मटेरियल का, सड़को पर उड़ती धूल का हो या चाहे आदिवासियों के खेतों में मटेरियल डंप का ही क्यों न हो, इससे इन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता .यह अपना सारा काम “आई ऍम द किंग ” की तर्ज पर ही कर रहा है। ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब यहाँ की आम जनता का गुस्सा फूटे और किसी गंभीर समस्या को जन्म दे रहे हैं।
