इस स्वार्थ की दुनियाँ मे सच्चा प्रेम हो पाना बड़ा ही मुश्किल होता है।

वात्सल्य :-” प्रेम का वास्तविक रूप” इस स्वार्थ की दुनियाँ मे सच्चा प्रेम हो पाना बड़ा ही मुश्किल होता है,जितने भी प्रेम के उदाहरण हम आजकल देखते है उसमें प्रेम कम हार्मोनल ऐक्ट्रेक्शन ज्यादा होता है। सच्चा प्रेम हर कोई नहीं समझ सकता है प्रेम का वास्तविक रूप है क्या है? इसके बारे में हर किसी को जानकारी नहीं होती है प्रेम तो हर रूपों में महान होता है जैसे एक माँ हो,एक बहन हो,एक पिता हो,या कोई प्रेमी हो अपने बच्चे, भाई बेटे या प्रेमी को अपने पसंदीदा नाम से पुकारती है। प्रेम आत्मा को परमात्मा से जोड़कर मन को निर्मल कर देता है अनन्त भावों का अथाह सागर में जहाँ वो इस दुनियाँ से बहुत दूर होकर एकांत में रहना चाहते हैं। प्रेम समझने की चीज नहीं है, प्रेम तो बस करने की चीज है। प्रेम एक भाव है जिसमें अनंत भाव विद्यमान हैं जैसे विरह, वेदना, आनंद, उत्सुकता ,आराधना,भक्ति,एकांत ,त्याग, क्रोध जैसे भाव। प्रेम जिसे आप आसानी से अनुभव कर सकते हैं लेकिन यदि आप इसे परिभाषित करना चाहेंगे तो ये आपके लिए जटिल हो जाता है। वास्तविक प्रेम हर बातों में हँसना, रोना,रूठना,मनाना होता है। आप को पता हैं इतने भावुक क्यों होते हैं? क्यूँकि मन निर्मल और ह्रदय पूरी तरह से निश्छल हो जाता हैं। तो बस इनके दिल मे रहता है सिर्फ प्रेम जो अपनी माँ की ममता के आंँचल को पाकर अठखेलियाँ करने लगता हैं, और न्यौछावर कर देता है माँ पर अपने उस अनजाने भावों को और यही बचपना सब को अच्छा लगता है इसी प्रकार का प्रेम अपने साथी के लिए होता है जो बुढ़ापे को भूल कर जब दोनों को बच्चा बना देती है,तब वो प्रेम श्रेष्ठ हो जाता है। हर बात पर रूठना फिर मनाना, छोटी सी बातों पर लड़ जाना, फिर तुरन्त रोकर एक दूसरे के गले लग जाना बचपना होता है प्रेम में। एक माँ अपने लाडले बच्चें को हर क्षण अपने नजरों के समक्ष रखती है, थोड़ी सी भी विरह बर्दास्त नहीं होती। सजा भी देती है तो आंखों में अश्रुधारा निकल उठते हैं। यही परिस्थिति जब प्रेमियों के बीच होती है, एक पल न तो वे एक दूसरे से अलग रह सकते और यदि गलतीं हुई तो रोकर एक दूसरे को मनाकर अपने उसी प्रेम के सागर में डुबकी लगाने लगतें है,जो उनके छोटे से दिल मे समाया हुआ है। उनकी प्यार भरी बातें,, उनका इठलाना,अल्हड़पन, एक दूसरे को नखरे दिखाना ये सारी बातें इस बात की निशानी है कि वो अब युवा से बच्चे हो गए, उनके हृदय में मोह नही बल्कि वात्सल्य का संचार हो गया, उनका हृदय बच्चो की तरह निश्छल,पवित्र एव निर्मल हो जाता है सच में जब प्रेमी अपने पराकाष्ठा पर होता है तब बच्चे बन जाते है यही प्रेम की विशेषता है। प्रकृति का नियम है… संसार की जितनी भी चीजे बनती है, समय के साथ परिपक्व होती है और नष्ट हो जाती हैं। ऐसे ही जिंदगी के प्रवाह में हम जन्म लेते हैं, युवा होते हैं फिर मर जाते है। परन्तु प्रेम में इसके विपरीत होता है। प्रेम के सागर के शुरुआती दौर में हम मैच्योर रहते हैं एक समझदार युवा रहते है, फिर बालक जैसा बनकर जानकर बूझकर नादानियां करते हैं, और जब प्रेम अपने पराकाष्ठा पर होता है तब वो एक दूसरे के प्रति शिशु बनकर पूर्ण निर्मल होकर अपने प्रेमी को प्यार भरे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं ताकि मरहम का कार्य करे। ऐसे शब्दों का उच्चारण करके हम उस अनुभूति को पा जाते हैं। आपके पास बस है प्रेम और सिर्फ प्रेम होना चाहिए, ऐसा प्रेम जो सिर्फ आपके महसूस करने के लिए ही बना हुआ होता हैं और हम एक शिशु बनकर महसूस करते हैं।

पूजा गुप्ता
मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)