बीजापुर – छत्तीसगढ़ में भाजपा की सत्ता आते ही बीजापुर जिले में चुने हुए जनप्रतिनिधियों पर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, कई जनप्रतिनिधियों ने चुनाव जीतते ही अपने परिवार और नज़दीकी दोस्तों के नाम से ठेकेदारी और सप्लाई के काम शुरू कर दिए। सरकारी दफ्तरों में निर्माण कार्य और सामग्री सप्लाई पाने वालों की भीड़ लगी रहती है, जबकि आम जनता के हितों को दरकिनार किए जाने की बातें खुलकर सामने आने लगी हैं।
बताया जा रहा है कि जिला पंचायत अध्यक्ष–उपाध्यक्ष, सदस्यों से लेकर जनपद पंचायत और नगरपालिका प्रतिनिधि तक, विकास कार्यों की बजाय “काम के जुगाड़” में जुटे हुए हैं। कार्यालयों में लगातार दबाव बनाकर निर्माण और सप्लाई के आदेश अपने प्रभाव क्षेत्र में बांटे जा रहे हैं।
सूत्रों का दावा है कि भारतीय जनता पार्टी के जिला नेतृत्व से जुड़े कुछ प्रभावशाली नेता भी इस खेल में सक्रिय हैं। आरोप है कि अपने नाम से कार्य स्वीकृत कराकर बाहरी ठेकेदारों को ऊंचे कमीशन पर काम सौंपा जा रहा है। कमीशनखोरी का यह तंत्र कथित तौर पर “पेटी सिस्टम” के जरिए चल रहा है, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान और गुणवत्तापूर्ण निर्माण पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सरकार द्वारा तय ₹5 लाख से अधिक के कार्यों को अनिवार्य टेंडर प्रक्रिया से देने के नियम भी कथित रूप से ध्वस्त किए जा रहे हैं। DMF, जिला निर्माण मद और केंद्रीय विशेष सहायता मद सहित पंचायतों के कई कामों को सांठगांठ के जरिए बांटे जाने की चर्चा है। नियमों की अनदेखी और पारदर्शिता के अभाव ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
स्थानीय नागरिकों और जानकारों का कहना है कि यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो विकास के नाम पर चल रहा यह खेल जिले की साख को गहरा नुकसान पहुंचाएगा। अब निगाहें प्रशासन और सरकार पर टिकी हैं—क्या आरोपों की जांच होगी, या फिर सत्ता के दबाव में यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा?
*कमीशन सिस्टम का दबे जुबान कबूलनामा:*
*“15 लाख के काम में 2.25 लाख सीधे भाजपा नेता को, 1.5 लाख ऑफिस खर्च—गुणवत्ता कहाँ से लाएँ?”*
गुंटूर से आए एक पेटी ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर चौंकाने वाला खुलासा किया है। ठेकेदार के अनुसार उसे लगभग 15 लाख रुपये का कार्य मिला है, लेकिन जिस भाजपा नेता ने काम दिलाया, उसे 15 प्रतिशत कमीशन के तौर पर 2 लाख 25 हजार रुपये देने हैं।
इसके अलावा डेढ़ लाख रुपये “ऑफिस खर्च” के नाम पर पहले ही निकल जाते हैं। ठेकेदार का कहना है—
“इतनी दूर से आए हैं तो कमाना भी पड़ेगा। ऐसे में काम की गुणवत्ता कहाँ से लाएँ? हमारा काम सिर्फ कार्य करना है, घटिया होगा तो नेताजी संभाल लेंगे।”
ठेकेदार ने आगे बताया कि
“ऑफिस में जैसे ही उस नेता का नाम लिया जाता है, अधिकारी और इंजीनियर सब चुप हो जाते हैं। कोई सवाल नहीं, कोई जांच नहीं।”
यह बयान नेता–ठेकेदार–अधिकारी गठजोड़ पर गंभीर सवाल खड़े करता है और सरकारी निर्माण कार्यों की गिरती गुणवत्ता की असल वजह उजागर करता है।
