लघुकथा* *विनम्रता*

*लघुकथा*

*विनम्रता*
फ़टे पुराने कपड़े पहने एक हाथ मे लाठी और दूसरे हाथ मे छाता लिए धीरे -धीरे कदम रखते हुए थका -थका सा एक बूढ़ा एक बड़े से होटल के अंदर आया । किसी ने उसकी ओर ध्यान नही दिया,लेकिन एक युवा कर्मचारी मुरली की नजर उस बूढ़े व्यक्ति पर पड़ी दौड़कर उसके पास गया और बड़े प्यार व अपनेपन से पकड़कर कुर्सी पर बिठाया। मुरली ने बड़ी विनम्रता से पूछा–‘आपके लिए क्या लेकर आऊँ?’ बूढ़े व्यक्ति ने बड़े शांत भाव से कहा-“बेटा मेरे लायक यहाँ क्या मिलेगा?” मुरली ने तपाक से उत्तर दिया-‘बाबूजी यहाँ सब मिलता है जो आप खाना चाहते है बस ऑर्डर कर दीजिए।’उसने समोसे और कॉफी का ऑर्डर दे दिया। मुरली ने कहा- ‘जी,बहुत अच्छा। मेरा नाम *मुरली* हैं मैं थोड़ी देर में आपका ऑर्डर लेकर आता हूँ। इस बीच अगर आपको किसी भी चीज की जरूरत हो तो मुझे आवाज दीजियेगा।’ गर्म कॉफी और समोसे खाकर उस बूढ़े व्यक्ति ने जैसे ही बिल चुकाने के लिए जेब मे हाथ डाला तो देखा कि उसके जेब मे पैसे नही थे। मुरली –उस बूढ़े की मनोदशा को एकटक निहार रहा था। वह बोला-‘बाबूजी आपके पास अगर बिल चुकाने के लिये रूपये नही है तो कोई बात नही अभी मैं बिल भर देता हूँ।’आते -जाते कभी भी दे दीजियेगा। ऎसा कहकर मुरली ने उन्हें कुर्सी से उठने में मदद की। सहारा देकर दरवाजे तक ले गया।’फिरआइयेगा’ कहकर विदा किया। लौटकर जब मुरली ने बुजुर्ग की टेबल की सफाई की तो उसे उस प्लेट के नीचे एक कार्ड , 10,000 (दस हजार रुपये)औऱ पेपर नेपकिन पर लिखा संदेश मिला। उसमे लिखा था — ‘प्रिय मुरली मैं तुम्हारा आभारी हूँ। आज मुझे मालूम पड़ा कि होटल की लोकप्रियता में तुम्हारा कितना बड़ा योगदान है।ग्राहकों के प्रति तुम्हारा व्यवहार तुम्हे और इस जगह को विशेष बनाता है।अपने स्वभाव को यूँ ही बनाये रखना। ईश्वर तुम्हें प्रसन्न एवं सफल बनायें। नैपकिन में लिपटे पदोन्नति एवं प्रशस्ति पत्र को पढ़कर मुरली की आँखों मे पानी आ गया।टिप देने वाला बूढ़ा व्यक्ति कोई औऱ नही बल्कि उस होटल का मालिक था,जिसे वहाँ काम करने वालों ने उस दिन पहली बार देखा था।
*विनम्रता* ऐसा प्रबल अस्त्र है जिसके आगे भले -बुरे दोनों स्वभाव के व्यक्तियों को परास्त होना ही पड़ता हैं।

ज्योत्सना भरतलाल कन्नौजे ज्योति महासमुन्द(छ• ग•)