प्रसिद्ध गीतकार मुकुंद कौशल को दी कवियों ने श्रद्धांजलि

प्रसिद्ध गीतकार मुकुंद कौशल को दी कवियों ने श्रद्धांजलि

राजिम 5 अप्रैल। स्थानीय प्रयाग साहित्य समिति द्वारा ऑनलाइन श्रद्धांजलि सभा का आयोजन कर देश के सुप्रसिद्ध गीतकार मुकुंद कौशल के निधन होने पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर उपस्थित शायर जितेंद्र सुकुमार साहिर ने कहा कि उनके साथ में समय बिताने का अनुभव रहा है। पहली बार जब उनसे मुलाकात हुई तो वह मेरा नाम सुनकर अपने साथ आदर पूर्वक बिठाया और कहा कि वर्तमान समय में गजल सीखने व जानने के लिए अच्छे-अच्छे रचनाकार आगे नहीं आ रहे हैं आप इस दिशा में सोच रहे हैं निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं। गजल की विधा अत्यंत सरल है बस इसे समझने की जरूरत है और फिर मैं उनके मार्गदर्शन से लगातार गजल के पंक्ति लिखता गया। उन्होंने मुझे अपनी ग़ज़ल चिराग ग़जलों के प्रदान किया जिसे आज भी संभाल कर रखा हूं। ऐसे सहज स्वभाव के शायर व गीतकार का जाना अत्यंत दुखदाई है। कवि समाज के लिए यह अपूर्णीय क्षति है। प्रयाग साहित्य समिति के अध्यक्ष टीकम चंद सेन ने कहा कि छत्तीसगढ़ प्रदेश कला संस्कृति एवं साहित्य का उत्कृष्ट उदाहरण है और इस बगिया को सजाने में मुकुंद कौशल के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। कवि एवं साहित्यकार संतोष कुमार सोनकर मंडल ने कहा कि वह हिंदी छत्तीसगढ़ी उर्दू व गुजराती भाषाओं में निरंतर लेखन कार्य को जारी रखा। छत्तीसगढ़ के प्रमुख गीतकार गजलकारों में मुकुंद कौशल का नाम बड़े अदब से शुमार किया जाता है। गजल एक उर्दू विधा है जिसे हिंदी में लाने का श्रेय दुष्यंत कुमार को जाता है और हिंदी से छत्तीसगढ़ी में लाने का प्रयास मुकुंद कौशल ने किया। उनकी छत्तीसगढ़ी गजलें कक्षा नवमीं के हिंदी एवं कॉलेज के पाठ्यक्रमों में शामिल है। हास्य कवि गोकुल सेन ने कहां कि कौशल जी किसी परिचय का मोहताज नहीं रहे। कला साहित्य एवं संगीत के क्षेत्र में अनवरत कार्य करते हुए ना केवल छत्तीसगढ़ बल्कि देश विदेश में अपनी पहचान कायम की लालटेन जलने दो, शब्द क्रांति, गीतों का चंदनवन, देश हमारा भारत, चिराग गजलों के, जमीं कपड़े बदलना चाहती है, भिंनसार, अमर भूंईया हमर आगास, माया के मुंदरी, केवरस, सिर पर धूप, आंखों के सामने के अलावा छ: छत्तीसगढ़ी गजल संग्रह भी मुकुंद कौशल के नाम हैं। कभी नूतन साहू ने बताया कि कौशल जी का राजिम से विशेष लगाव रहा है। साहित्यकारों को वह हमेशा बराबर का सम्मान देते रहे किसी को छोटा या बड़ा कहना उनके डिक्शनरी से गायब थी। वरिष्ठ कवि तुकाराम कंसारी ने कहा कि मोबाइल से उनसे हमेशा गोठ बात होती थी। उनमें अहम नाम की चीज ही नहीं थी उनका सरल स्वभाव निहायत ही लोगों को मुक्ध कर देती थी।