
“नफरत को अब ना कह दो”
ढाई अक्षर प्रेम का
ढाई अक्षर का है प्यार
नफरत को अब ना कह दो
बंद करो इसका व्यापार
चार अक्षर से बना शब्द यह
बना आज एक मंत्र महान
इसी मंत्र को जपते-जपते
अंधभक्तों का हुआ विहान
प्यार का यह होता विलोम
दो धर्मों में बैर कराते
रहते थे जो मिलके हरदम
अब न फूटी आँख सुहाते
इसी मंत्र के दम पर नेता
कुर्सी हथिया लेते हैं
चंद वोट के खातिर ये दिल में
बैर का बीज उगा देते हैं
आओ अब इस लफ़्ज़ का
हम नामोनिशाँ मिटा दें
शब्दकोश से करें बेदखल
प्यार ही प्यार बिठा दें।
दिनेश चौहान
