थोरको संतोष नइ हे—-

कलजुग के दुख पीरा ह,हावय जी बड़भारी|

चारों मुड़ा रोवत हावय,देखव सब नर नारी||

जेकर लइका नी हे,वोहा लइका बर रोवत हे|

जेकर लइका हे,वोहा लइका के मारे रोवत हे||

बने हाँस के बतावत हे,भवानी ल त्रिपुरारी—

जेकर कर धन नी हे,वोहा धन बर रोवत हे|

जेकर धन हे,हाय रे!मोर धन कहि रोवत हे||

धन के माया मोहो ह,फइले हे अत्याचारी–

जेकर कर नौकरी नी हे,वो नौकरी बर रोवत हे|

नौकरी वाला मन ह ये,नौकरी के मारे रोवत हे||

जानू-मानू रोवे के सब झन ल,लगे हे बीमारी–

किसान मन दवा,खातू अऊ किसानी म रोवत हे|

कभु नंगत सुक्खा,कभू बरसत पानी म रोवत हे||

जइसन रोना-धोना,जिनगी के बनगे हे लाचारी–

बिहाव नी होय त,एक झन छोकरी बर रोवत हे|

बिहाव पाछु छोकरी अऊ,डोकरी बर रोवत हे||

कका,बबा मन वोला,समझावत हे भारी–

इंहा जेन देखबे तेन,दाम अऊ काम बर रोवत हे|

फेर खोजे म नइ मिलिस,जेन ह राम बर रोवत हे||

राम के पूजा होथे,फेर घरो घर महाभारत हे जारी-

मोर हिसाब से एमा कलजुग के,कोनो दोष नइ हे|

कतको दे दे मनखे ल,मन म थोरको संतोष नइ हे|

अइसन कहत-कहत,हाँसन लागिस त्रिपुरारी—

रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”

शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद (छ.ग.)