बेटा ल दुरियावव झन।

बेटा ल दुरियावव झन

बेटी ल कतको पन्दौली दो,
फेर बेटा ल दुरियावव झन|
बेटा ल नालायक कहिके,
गोबर कस लतियावव झन|

ये सच हे बेटी ह ददा के,
मान अऊ सम्मान होथे |
फेर बेटा ह महतारी के,
गरब अऊ गुमान होथे||
बेटी के आघु म बेटा के,
स्वाभिमान ल चोट पहॅुचावव झन–

बेटी ल सीता बनाए खातिर,
बाप ल जनक बने ल पड़थे|
फेर बेटा ल राम बनाए बर,
दशरथ ल घुट-घुट के मरे ल पड़थे||
दुनों तोर आँखी के तारा ये,
फेर एक ल अंधरा बनावव झन–

बेटी ल श्रद्धा मान लिथो,
फेर बेटा पर बिस्वास करव नहीं|
बेटा के पीरा ल काबर फेर,
सुनव,समझव अऊ धरव नहीं||
बेटा के अंतरआत्मा ल,
तुमन जियादा रोवावव झन–

बिहाव के पाछु बेटी मन बर,
तुंहर मया हो जथे बड़ भारी|
फेर बेटा मन बर दाई ददा के,
भाखा ह हो जथे छुरी कटारी||
गृहस्थी के बोझ म लदे रीथे,
वोकर बोकरा हलाल करावव झन–

दामाद ल बेटा मान लिथो,
फेर बहू ल बेटी मानों नहीं|
बेटी अऊ बेटा के पीरा ल,
तुमन काबर एके जानों नहीं||
बेटा अऊ बेटी के बीच म,
नफरत के जहर फैलावव झन

रचनाकार:–श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, (छ. ग.)