सुखते फसल को बचाने क्षेत्र के किसानों ने मिलकर नदी का रुख ही बदल रहे हैं।

खरीफ में सूखे से निपटने बनी है करोड़ो लगता की 24 सिंचाई योजनाए कौड़ी के लायक पानी नहीं दे सकती।

गरियाबंद :- किसानों के फसल पर अब अल्प वर्षा का खतरा मंडराने लगा है, बोनी के बाद खेतो में नजर आ रहें दरारें किसानों को डराने लगीं है, इस समय खेतो को पानी की भारी जरूरत है, इसी जरूरत को पूरा करने तेल नदी पार बसे 7 गांव के 50 किसानों की मेहनत रंग ले आई। इस इलाके में सिंचाई सुविधा देने तेल नदी जलप्लावन योजना बना हुआ है, 9 गांव के 600 हेक्टेयर खेतो की सिंचाई के लिए 400 चेन यानी 12 किमी लंबी नहर भी बना हुआ है। लेकिन जलप्लावन के कुओं में तेल नदी का पानी नहीं आ रहा है। नहरों में भरे हुए रेत व जगह-जगह डेमेज हो चुके स्ट्रक्चर के कारण पानी अंतिम छोर तक भी नहीं पहुंच पा रहा था, ऐसे में दहीगांव, निष्टीगुड़ा, परेवापाली, सैंदमुड़ा, सुपेबेड़ा, मोटरापारा के करीबन 50 किसानों ने तीन दिन पहले नहरों में पानी ले जाने का प्रण लिया। किसान प्रवीन अवस्थी, विशु अवस्थी, सूर सिंह, बरपोटा, पंचम, थबीर मरकाम, परमेश्वर, भोजोराम ने बताया की पहले रेत बोरी और अन्य आवश्यक सामग्री के लिए आपस में चंदा जुटाया। फिर जलप्लावन में बने कुंए के आगे तेल नदी के बहते पानी को रोक कर कुएं की तरफ रुख किया। कुल्लू चलाकर केनाल में जमे रेत को बाहर निकाला, दहिगांव के पास नहर के क्षतिग्रस्त स्ट्रक्चर को रेत की बोरियों भर जाम करने की कोशिश किया। बुधवार दोपहर तक नहर का पानी परेवापाली तक पहुंच गया, अनुमान हैं देर रात तक अंतिम छोर सागुंनभाडी तक पहुंच जाएगा। किसान एकजुट होकर बारी-बारी से सभी खेतों में पानी भर रहे हैं। आज रात तक 1 हजार एकड़ को सींच लेने का दावा भी कर रहे हैं। रेत से भरे नहर व क्षतिग्रस्त स्ट्रक्चर को लेकर किसान में विभाग के प्रति आक्रोश है। किसानों ने बताया की 35 साल पुरानी इस योजना का सही फायदा अंतिम छोर में बसे 5 गांव को कभी नहीं मिला। आज पहली दफा किसानों के मेहनत से पानी अंतिम छोर तक पहुंच सकेगा।

समय पर साफ सफाई नहीं करने का लगाया किसानों ने आरोप

उक्त गांव के किसानों ने बताया कि नहर लाइनिंग का समय पर रख रखाव एवं साफ सफाई में विभाग द्वारा लगातार उदासीनता बरती जा रही हैं। जिसके वजह से पानी पर्याप्त मात्रा में किसानों को नहीं मिल पा रहा हैं, नहर लाइनिंग में भरे कचरे और पेड़ पौधे को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि विभाग अपने जिम्मेदारी के प्रति कितना सजग हैं।जिसको देखते हुए किसानों ने स्वयं चंदा कर एवं श्रम दान कर मरम्मत कार्य को करवाया हैं।

पानी के अभाव में 40 फीसदी रोपा ब्यासी का काम रुका

वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी जे एल नाग ने बताया की 25 हजार हेक्टेयर में खरीफ फसल लगाया गया है। 3 हजार में रोपा होना है। पिछले साल की तुलना में इस बार अब तक बारिश कम हुआ है। पिछले वर्ष अगस्त के पहले सप्ताह में 638 मिमि बारिश दर्ज थी,इस बार अब तक 418 मिमी दर्ज है। जिसके चलते 40 फीसदी रोपा बियासी का काम रुका हुआ हैं। कृषि अफसरों की माने तो कम बारिश के वजह से उत्पादन प्रभावित होगा।

15 साल में 300 करोड़ फूंक,योजना बढ़ाया नहरों के जाल बिछाया

देवभोग सिंचाई अनुविभाग के अधीन 24 सिंचाई योजनाएं बनाई गई है। सभी योजनाएं वर्षा पर ही निर्भर हैं। रिकार्ड के मुताबिक इन योजनाओं से देवभोग व अमलीपदर तहसील के 80 गांव के 7004 हेक्टेयर सिंचाई सुविधा देने के अनुरूप रूपांकन किया गया।हैरानी की बात तो यह है की केवल वर्षा के जल पर आश्रित इन योजनाओं में भाजपा सरकार के 15 साल में 150 किमी लंबी मुख्य व शाखा नहरों का जाल बिछा दिया गया।उन 15 साल में स्ट्रक्चर व नहर बनाने, इसी इलाके में 300 करोड़ रुपए पानी की तरह बहाया गया। तैयार सिंचाई योजनाओं की जल भराव क्षमता,जल आवक के स्रोत के अलावा अन्य तकनीकी विकल्प को दरकिनार किया गया।किसान के आड़ में ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने बड़े व ऊपरी लेबल पर यह खेल खेला गया। सूखे व कम वर्षा की इन हालात में आज किसी भी योजना से सिंचाई लाभ किसानों को नहीं मिल पाना,योजनाओ की हकीकत बयां कर रहा है।

मरम्मत के लिए 40 करोड़ बजट में शामिल

विभाग के एसडीओ दीपक पाठक ने कहा कूम्हडई घाट के तेल नदी जलप्लवान से सिंचाई सुविधा मिल रही थी, घूमरापदर जलाशय से भी पानी छोड़ा जा रहा है। कम बारिश के कारण टैंक व जलाशय में 20 फीसदी से कम भराव हुआ है। कई जलाशय तो नील है। आगामी दिनों में सिंचाई लाभ सुचारू रूप से दिया जा सके इसलिए आवश्यकता अनुसार 14 योजनाओ के नहर लाइनिंग, स्ट्रक्चर मरम्मत के लिए लगभग 40 करोड़ के कार्य का प्रपोजल राज्य सरकार ने बजट में शामिल किया गया है।