
शपथ–शपथ–शपथ–
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शपथ–शपथ–शपथ,
यह सुनकर मैं व्यथित,
बैचेन और हैरान हूँ–
सच कहूँ तो अब इस,
शब्द से ही परेशान हूँ,
क्योंकि,,,,
देशभक्ति की शपथ लेने वाले
देश को टुकड़ों में बाँट रहे हैं|
पेड़ लगाने की शपथ लेकर,
लोग खुलेआम पेड़ काट रहे हैं ||
कुछ लोग तो नशा करके ही,
नशा मुक्ति की,शपथ लेते हैं|
मदहोशी की हालत में साहब,
वाकई जबरदस्त सलाह देते हैं||
नारी सशक्ति का नारा देने वाले,
कोर्ट में तलाक की अर्जी दिये हैं|
धर्म और परंपरा की दुहाई देकर,
नारी के साथ मनमर्जी किये हैं||
आपको पता है न,अदालत में लोग,
गीता और कुरान की कसम खाते हैं|
मुट्ठी भर पैसों के लिए,वही शख़्स,
बाजार में धरम ईमान बेच आते हैं||
अब पता नहीं लोग ,कब तक,
कौन-कौन सा कसम खायेंगे|
शपथ–शपथ–शपथ कहकर,
लोगों को कब तक यूँ भरमायेंगे|
उपरवाले ने इंसान बनाया है तो,
अब चल तू इंसान बनकर दिखा दे|
शपथ को कर्तव्य समझ कर चल,
इंसानियत का निशान बनकर दिखा दे||
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद, छ.ग.
