
राजिम :- मायका ई-रिक्शा से पहुंची पथर्रा की बेटी गायत्री साहू पंडित सुंदरलाल शर्मा चौक के पास बस स्टैंड में सवारी बिठाकर आगे बढ़ रही थी इन्हें देखकर हर कोई यही कह रहे थे कि अब महिला अबला नहीं बल्कि सबला है। ड्राइवर का काम सिर्फ पुरुष करते हैं इस परंपरा को 21 वीं सदी की नारियों ने तोड़ दी है जिनका जीता जागता उदाहरण देखने को मिला है। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि उनकी मायका शहर के वार्ड क्रमांक 14 पथर्रा है। इसी शहर में पली-बढ़ी है। सन् 2008 में धमतरी के पास गातापार गांव में ब्याह कर गई है। पति रोजी मजदूरी का काम करते हैं बहुत दिनों से इनको तलाश थी कि कोई काम किया जाय। दोनों पति पत्नी मिलकर काम करेंगे तो इनकम बढ़ेगी। तीन बच्चों में दो बालिका तथा एक बालक है। बच्चे स्कूलों में पढ़ाई करते हैं। पति खोमेश साहू भी ड्राइविंग का काम करते हैं। हम दोनों के इनकम ई-रिक्शा से ही आती है। वह बताती है कि महिला समूह में जुड़ने के बाद राजधानी रायपुर में 15 दिनों का ट्रेनिंग हुआ जिसमें महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के गुर सिखाए गए। इनमें मुझे ई-रिक्शा चलाना अच्छा लगा और आवेदन लगा दी। डेढ़ लाख की सब्सिडी मिली तथा मात्र ₹30 हजार मुझे देना पड़ा और सन् 2018 में ई-रिक्शा मेरे घर आ गई। शुरू शुरू में चलाने में झिझक होती रही, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ संभल गया और अब तो मैं लोकल धमतरी के अलावा आसपास के गांव में भी सवारियों को उनके घर तक पहुंचाती हूं। इससे मुझे जो कमाई होती है उससे परिवार का खर्चा चल जाता है तथा बच्चों की पढ़ाई के लिए कुछ पैसे भी बचा रहे हैं। एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने बताया कि गाड़ी बिगड़ जाने पर बड़ी दिक्कत होती है इनके पार्ट्स शहर में नहीं मिलते अलबत्ता ऑर्डर देकर मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई इत्यादि बड़े शहरों से मंगाना पड़ता है। कुछ समान दुर्ग में भी उपलब्ध हो जाते हैं। गाड़ी के पार्ट्स नहीं मिलने के कारण बड़ी दिक्कत होती है। सुबह 10:00 बजे ड्यूटी पर आ जाती हूं और शाम होने से पहले अपने घर के लिए निकल जाती है। ई-रिक्शा ने हमारे जीवन जीने का ढंग बदल दिया।
कक्षा आठवीं तक पढ़ी है गायत्री साहू

ई रिक्शा में सफर कराने वाली गायत्री साहू मात्र कक्षा आठवीं तक पढ़ी हुई है लेकिन वह कहती है कि जिंदगी को अच्छे ढंग से जिया जाए तो खुशहाल हो जाती है। नकारात्मकता बरबाद कर देती है इसलिए सकारात्मक विचारधारा के साथ काम करती हूं। कई बार पियक्कड़ सवारी भी बैठ जाते हैं परन्तु डर नहीं लगता। छत्तीसगढ़ की संस्कृति और संस्कार पर मुझे पूरा भरोसा है। अब तो महिलाएं घर के चारदीवारी तक सीमित नहीं है। बड़े से बड़े काम कर रही है डिफेंस के अलावा टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। महिला समूह ने मेरे हाथों को काम दिया है मैं शुक्रगुजार हूं। जिनके बदौलत दो निवाला अपने बच्चों को खिला पा रहे हूं।
अन्य महिलाओं के लिए रोल मॉडल बनी गायत्री
अन्य महिलाएं जो अपने आप को कमजोर समझती है काम करने करने में झिझक तथा शर्म करती है ऐसे लोगों के लिए उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरी है। उन्होंने कहा कि मन में ठान ले तो क्या नहीं किया जा सकता। हमने सोचा काम करना चाहिए और प्रदेश सरकार का सहयोग के चलते महिला समूह ने मुझे रास्ता दिखाया जिसके परिणाम स्वरूप लोगों को उनके घर तक पहुंचाने का पुण्य भी कमा रही हूं और पैसे भी। ना सिर्फ राजिम और धमतरी के महिलाओं के लिए रोल मॉडल है बल्कि पूरे प्रदेश में इनके काम की तारीफ हो रही है। उन्होंने आगे कहा कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा हर महीना मोटिवेशनल कार्यशाला का आयोजन किया जाना चाहिए जिससे आगे बढ़ने में मदद मिले।
