राजिम:-लोककला और संस्कृति एक कलाकार के लिए जीवन का अभिन्न अंग होती हैं।कला के निरंतर अभ्यास से व्यक्तित्व में निखार आता हैं अपनी मिट्टी की महिमा को विभिन्न पारंपरिक विधा के माध्यम से जनमानस तक पहुंचाकर कलाकार धूमिल हो रही संस्कृति को पुनर्जीवित करने का कार्य बखूबी करते हैं। आधुनिकता और प्राचीन परंपरा के संयोजन से एक नई दिशा प्रशस्त होती हैं जिसमें छत्तीसगढ़ की भाषा-बोली रहन-सहन लोक पर्व और तीज त्यौहार का समावेश होने के साथ नवीनता के दर्शन होने से उसमे रोचकता आ जाती हैं। कलाकार कला में ही जिंदगी जीने के विभिन्न आयाम प्राप्त कर लेते हैं। राजिम माघी पुन्नी मेला में नित नए कार्यक्रम से छत्तीसगढ की महत्ता देश के हर कोने में फैल रही हैं इसी कड़ी में सातवें दिन सांस्कृतिक मंच क्रमांक दो में पुरुवा संदेश कोसमबुड़ा से पुरूव संदेश लोक कलामंच के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति से मंच को सुशोभित किया। मंच के संस्थापक एवं मुख्य गायक गिरिवर सिंहधुव्र ने दैनिक अजय उजाला कार्यालय में रिपोर्टर सरोज कंसारी से भेंटवार्ता में बताया की लगभग बीस वर्ष से छत्तीसगढ की कला को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा हैं। जैसे सूर्य के उदय होने से चारों तरफ़ उजियारा होता हैं और हमें उठने और जागने का संदेश देते हैं और

किसानों को अपने काम के लिए जागृत करते हैं वैसे ही पुरूवा संदेश मंच के माध्यम से हम अपनी संस्कृति को बचाने के लिए लोगो को प्रेरित करते हैं और मंच के नामकरण के उद्देश्य को सार्थक करने का प्रयास करते हैं। टीम में कुल तीस सदस्य है जिन्हे प्रशिक्षित करने के लिए कोरियोग्राफर हैं। अपने कला सफ़र को सांझा करते हुए कहा की रंग रसोवर चंदैनी गोंदा से जुडे है साथ ही नाचा मंडली आदिवासी लोकनृत्य के भी संचालक हैं। आज की युवापीढ़ी को लोककला संस्कृति से जोड़ने के लिए हम बारहमासी गीत नृत्य के के माध्यम से बारह महीने होने वाले पर्व और तीज त्यौहार को दर्शाते है जिसमें फूहड़ता का बिल्कुल भी समावेश नहीं होता टीम के मुख्य आकर्षण के केंद्र दो बौने है जो बीच-बीच में दर्शकों का मनोरंजन करते हैं नए कलाकारों को संदेश देते हुए कहते हैं की आज सभी सोशियल मीडिया में पागल हैं मोबाईल के टच में तो दिन रात है लेकिन अपनो के टच से बाहर हैं जो ग़लत हैं शार्टकट के चक्कर मे न रहे मेहनत को ईमान बनाए और आगे बढ़ते रहे। आदिवासी लोकनृत्य लेकर उज्जैन महाकुंभ इलाहबाद भी गए है। राज्य सरकार द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम सोनाखान में प्रस्तुत किया गया राज्य सरकार द्वारा आदिवासी नृत्य को सम्मानित किया गया। मेरे गुरु मेरे पिताजी है जों नाचा मंडली चलाते थे हम अभी मार्च मे आठ गीत जिसे मैंने आवाज दी है एलबम रिलीज होने वाली है आशा है वह लोकप्रिय होगी और दर्शकों का प्यार मिलेगा। प्रमुख गीत है-चली आबे भवानी मैया मोर… आमा के छैया जोर के भैया मोर… नदिया के तीर आबे न मया बरसा… आदी हैं। यूट्यूब मे लोक परंपरा चैनल है जिसने लुप्त हो रहीं विधा को प्रमुखता दिया गया है जिसके तीन हजार सब्सक्राइबर और दो लाख व्युजर है आने वाली हैं l शासन से यही निवेदन है कलाकारों को मेहनत के अनुसार फल देवे छोटे-बड़े मंच में कलाकारो को बांटकर भेदभाव न करें मंच दो में प्रस्तुति देकर संतुष्ट नहीं फिर भी आगे उम्मीद हैं मुख्य मंच में आगे अवसर मिलेगा। दैनिक अजय उजाला कार्यालय में प्रधान संपादक अजय देवांगन, सप्ताहिक खबर गंगा की स्थानीय संपादक पिंकी साहू रिपोर्टर सरोज कंसारी ने पुष्प गुच्छ भेंट करके छत्तीसगढ के महान कलाकार का आत्मीय अभिनंदन किया।

