कोंडागांव – अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना “चारा फसलें एवं समीक्षा” कृषि विज्ञान केंद्र, पूर्वी बोरगांव के अंतर्गत जनजातीय उप योजना कोंडागांव में एक दिव्य प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को उन्नत चारा उत्पादन, पशुधन प्रबंधन और समन्वित कृषि प्रणाली के माध्यम से आय वृद्धि के लिए सलाह देना है। जिलों के वैज्ञानिकों, आदिवासियों एवं कृषि विशेषज्ञों के प्रशिक्षण में सक्रिय रही।
कार्यक्रम की शुरुआत कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुखों द्वारा कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई। उन्होंने कहा कि पशुधन भारतीय कृषि व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। कृषि विश्वविद्यालयों की अधिसूचना बनाना तथा दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक चारा प्रबंधन की अत्यंत आवश्यकता है। गुणवत्ता पूर्ण फसलें अपनाकर किसान श्वेत क्रांति के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने किसानों को समन्वित कृषि प्रणाली अपनाकर स्थिर आय सुनिश्चित करने की सलाह दी।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नगर पंचायत फरसगांव के अध्यक्ष प्रशांत पॉटर ने अपनी समीक्षा में कहा कि कृषि देशों का उद्योग प्रमुख है और भारत एक प्रमुख राष्ट्र है। उन्होंने किसानों से राज्य एवं सरकार द्वारा संचालित कृषि अध्यादेश का लाभ लेकर आधुनिक एवं उन्नत कृषि केंद्र को समाधान की पेशकश की।
अखिल भारतीय समन्वय अनुसंधान परियोजना के प्रभारी डॉ. संतोष झा, कृषि कॉलेज, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर ने बताया कि पशुधन आधारित आय में वृद्धि में कैरेमिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने किसानों को चारा उत्पादन प्रणाली, भूखा तथा समन्वित कृषि अपनाकर अतिरिक्त आय अर्जित करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही युवाओं से कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क बनाए रखने का आग्रह किया गया, ताकि आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी के माध्यम से रोजगार एवं कृषि के अवसरों को बढ़ाया जा सके।
विशिष्ट अतिथि जिला अध्यक्ष मानकू राम नेताम ने किसानों को लाभ उठाने और सतत तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त करने की सलाह दी। कार्यक्रम में युवा सना ने किसानों को वैकल्पिक वैकल्पिक व्यवसाय व्यवस्था पर जोर दिया। वहीं प्रवीर बदेशा ने किसानों को जल संकट एवं रासायनिक खेती की ओर प्रकाश डालने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम के अंत में जन जातीय उप योजना के अंतर्गत 20 पंथीय सैनिकों को उन्नत नस्ल की खाकी कैंपबेल बकेट के चूजे मुफ्त में दिए गए। इस पर जिला उपाध्यक्ष श्री सुकलाल मरकाम, कृषि स्थायी समिति की अध्यक्ष श्रीमती लीलावती नेताम, उपाध्यक्ष एवं टुकड़ा सहकारी समिति निधि एस. नेताम सहित 12 साइंटिस्ट और कुल 96 किसानों ने प्रशिक्षण में भाग लेकर लाभ प्राप्त किया। डॉ. विप्लव चौधरी, संगीत विशेषज्ञ ने किसानों को समन्वित कृषि प्रणाली और चारागाह में मिट्टी के उपयोग के संबंध में विस्तार से जानकारी दी। यह प्रशिक्षण एवं कार्यक्रम किसानों के लिए ज्ञान संवर्धन प्रेरणादायक सिद्ध हुआ, जिससे क्षेत्र में आधुनिक कृषि, लघु एवं कुटीर खेती को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई गई।
कम खर्च में ज्यादा फायदा – डॉ. हितेश कुमार मिश्रा
खाकी कैम्पबेल बत्तख की नस्ल मूल रूप से इंग्लैंड की है। खाकी कैंपबेल डक किसानों के लिए बेहद उपयोगी मनी है क्योंकि यह कम खर्च में ज्यादा फायदा देती है। इस नस्ल से वर्ष में लगभग 250-300 अंडे मिलते हैं, जिससे किसानों को नियमित आय प्राप्त होती है। इसका पालन करना आसान है और यह सरकार, तालाबों और खुले वातावरण में अच्छी तरह से रह सकती है। इसका भोजन पारंपरिक अनाज, घास और कीट-मकौड़े से बना होता है, जिससे चारे का खर्च कम रहता है। अंडे और मांस दोनों की बाजार में अच्छी मांग होने से किसानों को अतिरिक्त सामग्री मिलती है। छोटे एवं छोटे मशीनरी किसानों के लिए यह कम इन्वेस्टमेंट में एक अच्छा विकल्प है तथा यह नस्ल विशेष रूप से अधिक अंडा उत्पाद के लिए प्रसिद्ध है।
एक्रिप जनजातीय उप योजना के अंतर्गत किसानों को प्रशिक्षण दिया गया
प्रशिक्षण में चारा फसल विधि, वर्गीकरण एवं वर्गीकरण का वर्णन किया गया है
