*ग़ज़ल*

*कैद में हर आदमी की ज़िंदगी है आजकल*
*शादमानी कुछ नहीं बस बेबसी है आजकल*

*ज़ह्र किसने घोल दी है इन फ़ज़ाओं में बता*
*मुश्किलों में देखो हर सू आदमी है आजकल*

*बुझ गये दीपक सभी रौशन हुये थे जो कभी*
*और नज़र जाती जहाँ तक तीरगी है आजकल*

*तेरी रहमत का सहारा है सभी को ऐ खुदा*
*अस्पतालों में दवाओं की कमी है आजकल*

*तीरगी का खौफ़ इतना बढ़ गया है मौज क्यों*
जिस्म से साया भी लगता अज़नबी है आजकल

*डी.पी.लहरे”मौज”*
*कवर्धा छत्तीसगढ़*