
पखांजूर से बिप्लब कुण्डू-(29.4.21)
पखांजूर आधुनिकता के दौर में हम भले ही चाँद पर पहुच चुके है। लेकिन उस गुजरे वक्त के जिन तौर तरीकों ने हमें आज इतना आधुनिक बनाया है उन तौर तरीकों को बचाने के लिए कुछ लोग आज भी जद्दोजहद कर ज़िंदा रखने की एक कोशिश कर रहे है। बस्तर हमेशा से अपने अनूठी संस्कृति के साथ अपने रहन सहन खानपान के लिए अलग पहचान रखता है।
बस्तर के आज भी ऐसे कई इलाके है जहाँ के लोगों ने बिजली की रौशनी कैसी होती नहीं देखा है। वे आज भी अपनी प्यास बुझाने के लिए झरिया की पानी का इस्तेमाल करते है। उन्ही पारम्परिक तौर तरीकों में शुमार लकड़ी से बने अनाज कुटाई के ढेकी और मुसल आज भी इस्तेमाल किये जाते है और उन लकड़ी औजारों से कुटाई किये गये अनाजों का स्वाद आधुनिक मशीनों से कुटे गये अनाज से बिलकुल जुदा होता है। भले ही आधुनिक मशीनों ने लोगों के काम को आसान कर दिया है लेकिन एक तरफ उसके पौष्टिक गुणों को भी खत्म कर दिया है। बस्तर के बीहड़ अंचलों में अनाज कुटाई के इस्तेमाल किये जाने वाले लकड़ी से बने ढेकी और मुसल के इस्तेमाल किये जाने पर ग्रामीण महिलाएं बताती है उनके गाँव में बिजली नहीं अनाज कुटाई के लिए आधुनिक मशीनें भी नहीं है इसकी वजह से वो आज भी अपने धान कोदो कुटकी सहित दलहन की कुटाई के लिए लकड़ी से बने ढेकी और मुसल का इस्तेमाल करते है। इसके इस्तेमाल से अनाज का पौष्टिक गुण बरकरार रह स्वादिष्ट होता है उन्हें मशीनों से कुटाई किया गया अनाज का स्वाद बिलकुल अच्छा नहीं लगता इसलिए उनके गाँव सभी ग्रामीण महिलाएं ढेकी और मुसल का ही इस्तेमाल करती है। यहाँ तक की अपने खेतों में अनाजों पैदावार में भी किसी प्रकार कोई रासयनिक खाद के उपयोग से आज भी परहेज बनाकर रखे हुए इसलिए उनका अनाज आज भी पुरी तरह से नेचरुल है जिसके वजह से उन्हें कोई बीमारी अपना शिकार नहीं बनाती है।
