पतझड़ होने का,पेड़ों का अपना ही मज़ा होता है, कुछ बोझ गिर जाते हैं, सूखे पत्ते बन कर,,
नए उमंगे लाते हैं, नए नए पत्ते जमकर,,
दोपहर की गर्म हवाएं, काली पड़ती तन जलकर,,
शाम रोशनी की छटाएं, लौट चलती जैसे रथ दिनकर,,
सूखे डंठल पेड़ो की, सुखी सुखी टहनियां,,
सूखे पड़े नाले सारे, सुखी सुखी सारी नदियां,,
परिंदे गर्मी की तपन से दूर, डाले डेरा झीलों के किनारे,,
जंगल का राजा भी, तलासते जल सरोवर किनारे ,,
ये पतझड़ तू वन ही नहीं, जंगल के लिए उमंग हैं,,
तू जीव जंतु की खुशी , तू उनकी जिंदगी तरंग है,,
एहसास है हमे भी तुममे जड़ होने का,,
तुम्हारा भी अपना सजा होता है,,
पतझड़ होने का, पेड़ो का भी अपना मज़ा होता है ।
लोकेश वैष्णव
छुरा (गरियाबंद)
