राजयोग ही विश्व में शांति ला सकता है – ब्रह्मा कुमार रामनाथ भाई।

नवापारा(राजिम) :- वर्तमान समय विश्व में इंसान ,अंध श्रद्धा ,तत्व पूजा व अज्ञान की जंजीरों में ऐसा बुरी तरह जकड़ चुका है कि इसे मुक्त होना वर्तमान धर्म पद्धति के बाहर है सिर्फ आध्यात्म ही अज्ञान की गहरी नींद से जगा सकता है। यह कार्य किसी मानव का नहीं सर्व शक्तिमान परमात्मा ही कर सकता है। उसकी शिक्षाएं आध्यात्म के रूप में जब मनुष्य मात्र के पास पहुंचती है तो मनुष्य का विवेक जागृत हो जाता है ।उसके अंदर सत्य असत्य को पहचानने की शक्ति प्राप्त हो जाती है ।यही से जीवन निर्माण सुसंस्कार की नीव प्रारंभ होती है। इसी लक्ष्य को लेकर विश्वयापी आध्यात्मिक संगठन ब्रह्माकुमारी संस्थान जो आज देश में ही नहीं संपूर्ण विश्व के 173 से अधिक देशों में आध्यात्म के द्वारा वर्तमान धार्मिक क्रियाकलापों ,अंधविश्वास से दूर स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन का नारा बुलंद करता हुआ आज मानव का सच्चा मसीहा बना हुआ है।

आज के युग में जबकि चारों ओर अशांति ही अशांति है विश्व बंधुत्व की भावनाओं का नाम निशान मिट चुका है। चारों ओर विश्व शत्रुता की भावना ही नजर आ रही है।। एक दूसरे पर अविश्वास की भावना ही बढ़ रही है। ऐसे समय में ध्यान योग ही विश्व में शांति ला सकता है। ऐसा योग जिससे आत्मा का अंधकार दूर हो राग द्वेष समाप्त हो रज और तम के बजाय सत्व गुण का प्रादुर्भाव हो और विश्व में शत्रुता समाप्त होकर भाई भाई की भावना जागृत हो ।यह विचार माउंट आबू से पधारे ब्रह्मा कुमारीज धार्मिक प्रभाग के मुख्यालय संयोजक ब्रहमा कुमार रामनाथ भाई ने ओम शांति कॉलोनी में स्थित ब्रहमा कुमारी के ग्लोबल पीस हाल मैं नगर वासियों के लिए आयोजित कार्यक्रम में बताया।

दिल्ली सेआई ब्रह्माकुमारी राजेश्वरी बहन ने बताया परिवर्तन चक्र तीव्र गति से घूम रहा है। सामाजिक स्थिति बहुत तेजी से बदल रही है। ऐसे में मनुष्य एक विचित्र से झंझावात में फंसा हुआ है। बाह्य रूप से चारों ओर भौतिक एवं आर्थिक प्रगति दिखाई देती है, सुख-सुविधा के अनेकानेक साधनों का अंबार लगता जा रहा है, दिन-प्रतिदिन नए-नए आविष्कार हो रहे हैं, पर आंतरिक दृष्टि से मनुष्य टूटता और बिखरता जा रहाहै।बुराई के साम्राज्य में अच्छाई के दर्शन अपवाद स्वरूप ही हो पाते हैं।

जो देश कभी जगद्गुरु हुआ करता था, उसी भारतवर्ष के राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक एवं व्यक्तिगत जीवन में चतुर्दिक् अराजकता और उच्छृंखलता छाई हुई है। जीवन मूल्यों एवं आदर्शों के प्रति आस्था-निष्ठा की बात कोई सोचता ही नहीं। वैचारिक शून्यता और दुष्प्रवृत्तियों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ दिशाहीन मनुष्य पतन की राह पर फिसलता जा रहा है। उसे संभालने और उचित मार्गदर्शन देने वालों का भी अभाव ही दिखाई देता है। कुछ गिने-चुने धार्मिक-आध्यात्मिक संगठन, सामाजिक संस्थाएं और प्रतिष्ठान ही इस दिशा में सक्रिय हैं अन्यथा अधिकांश तो निजी स्वार्थ एवं व्यवसायिक दृष्टिकोण से ही कार्यरत लगते हैं। ईमानदारी, मेहनत और सत्यनिष्ठा के साथ निःस्वार्थ भाव से स्वेच्छापूर्वक जनहित के कार्य करने वालों को लोग मूर्ख ही समझते हैं। उनके परिश्रम एवं भोलेपन का लाभ उठाकर वाहवाही लूटने वाले समाज के ठेकेदार सर्वत्र दिखाई देते हैं। इस अवसर पर इंदौर से पधारे ब्रह्मा कुमार नारायण भाई ने बताया कि

समाज सेवा का क्षेत्र हो या धर्म-अध्यात्म अथवा राजनीति का, चारों ओर अवसरवादी, सत्तालोलुप, आसुरी प्रवृत्ति के लोग ही दिखाई देते हैं। शिक्षा एवं चिकित्सा के क्षेत्र, जहां कभी सेवा के उच्चतम आदर्शों का पालन होता था, आज व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के केन्द्र बन गए हैं। व्यापार में तो सर्वत्र कालाबाज़ारी, चोरबाजारी, बेईमानी, मिलावट, टैक्सचोरी आदि ही सफलता के मूलमंत्र समझे जाते हैं। त्याग, बलिदान, शिष्टता, शालीनता, उदारता, ईमानदारी, श्रमशीलता का सर्वत्र उपहास उड़ाया जाता है। सामान्य नागरिक से लेकर सत्ता के शिखर तक अधिकांश व्यक्ति अनीति-अनाचार के आकंठ डूबे हैं। प्रत्येक व्यक्ति के मन में निजी स्वार्थ व महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ ईर्ष्या, घृणा, बैर की भावनाएं जड़ जमाए हुए हैं। ऐसी विकृत मानसिकता के चलते मनुष्य वैज्ञानिक प्रगति से प्राप्त सुख-सुविधा के अनेकानेक साधनों का भी दुरुपयोग ही करता रहता है। फलतः उसका शरीर अन्दर से खोखला होकर अनेकानेक रोगों का घर बनता जा रहा है। मनुष्य की इच्छाओं व कामनाओं की कोई सीमा नहीं है, धैर्य व संयम की मर्यादाएं टूट रही हैं, अहंकार व स्वार्थ का नशा हर समय सिर पर सवार रहता है। ऐसी स्थिति में क्या सामाजिक समरसता व सहयोग की भावना जीवित रह सकती है? सुख, शान्ति व आनन्द के दर्शन हो सकते हैं? जहां चारों ओर धनबल और बाहुबल का नंगा नाच हो रहा हो, घपलों-घोटालों का बोलबाला हो, उस समाज में क्या वास्तविक प्रगति कभी हो सकती हैं?

मानव के इस पतन-पराभव का कारण खोजने का यदि हम सच्चे मन से प्रयास करें तो पता चलेगा कि सारी समस्याओं की जड़ देहअभिमान है है। सारा संसार की अर्थप्रधान हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति इसके लिए अनीति, अनाचार, भ्रष्टाचार जैसे सभी साधनों का खुले आम प्रयोग कर रहा है। इस प्रकार कमाए हुए धन के कारण ही समाज में सर्वत्र मूल्यविहीन भोगवादी संस्कृति का अंधानुकरण और विलासिता का अमर्यादित आचरण चारों ओर देखा जा सकता है। यह सब जानते समझते हुए भी आदमी पैसे के पीछे पागल हो रहा है।

युवा वर्ग पर इसका प्रभाव

आज का युवा वर्ग ऐसे ही दूषित माहौल में जन्म लेता है और होश संभालते ही इस प्रकार की दुखद एवं चिन्ताजनक परिस्थितियों से रूबरु होता है। आदर्शहीन समाज से उसे उपयुक्त मार्गदर्शन ही नहीं मिलता और दिशाहीन शिक्षा पद्धति उसे और अधिक भ्रमित करती रहती है। ऐसे दिग्भ्रमित और वैचारिक शून्यता से ग्रस्त युवाओं पर पाश्चात्य अपसंस्कृति का आक्रमण कितनी सरलता से होता है, इसे हम प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं। भोगवादी आधुनिकता के भटकाव में फंसी युवा पीढ़ी दुष्प्रवृत्तियों के दलदल में धंसती जा रही है। विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान जो युवाओं की निर्माण स्थली हुआ करते थे आज अराजकता एवं उच्छृंखलता के केन्द्र बन गए। कार्यक्रम के अंत में सभी को राजयोग मेडिटेशन का अभ्यास कराया गया कार्यक्रम का संचालन ब्रह्माकुमारी प्रियाबहन ने किया।