
सहस्रों को मार्ग बताता, अंधकार में राह दिखाता
सत्य-पथ पर चलने के लिए, नीति-न्याय का पाठ पढ़ाता
और अनीति-अन्याय-अत्याचार होने पर लड़ा हूँ मैं
शिक्षक हूँ, ज्ञान की मशाल लिए खड़ा हूँ मैं !
राम-कृष्ण-गौतम की भूमि, गुरुनानक-पैगंबर-ईशु की धरती
यहाँ गुरु की उतारते आरती, जिन पे नाज करती है भारती
चंदन-सा युगों-युगों से भारत के माथे पर जड़ा हूँ मैं
शिक्षक हूँ, ज्ञान की मशाल लिए खड़ा हूँ मैं !
अब, सरकारें आतीं-जातीं, हमसे सीखकर हमें ही सिखातीं
हमारी नि:स्वार्थ सेवा के बदले, हमको ही आँखें दिखातीं
कल संपूर्ण देश था, भले ही आज हाशिए में पड़ा हूँ मैं
शिक्षक हूँ, ज्ञान की मशाल लिए खड़ा हूँ मैं !
जब भी अधिकार की बात करते, समाज के द्वारा कोसे जाते
‘इनके पास नहीं कोई काम है, शिक्षक बस करते आराम हैं’
फिर भी क्यों हमेशा हर सरकारी काम में पड़ा हूँ मैं?
शिक्षक हूँ, ज्ञान की मशाल लिए खड़ा हूँ मैं !
पहले की भाँति, अनुशासन के लिए दंड न दे सकते हैं
बस थोड़ी मर्यादा और थोड़े सम्मान की आस रखते हैं
फिर क्यों अपने ही विद्यार्थियों के अपमान की भेंट चढ़ा हूँ मैं?
शिक्षक हूँ, ज्ञान की मशाल लिए खड़ा हूँ मैं !
आदर्शों-मूल्यों की बातें छोड़िए, शिक्षा एक व्यवसाय बना है
कौन है इसका जवाबदेह? निजी संस्थानों को किसने जना है?
इन दिनों आख़िर क्यों इन झंझावतों में पड़ा हूँ मैं?
शिक्षक हूँ, ज्ञान की मशाल लिए खड़ा हूँ मैं !
सागर कुमार शर्मा
व्याख्याता एवं एनसीसी अधिकारी
राजिम
