सावन के झड़ी

सावन के झड़ी

धुँक-धुँक के गिरत हे झिमिर-झिमिर पानी।
गरजत हे बादर, छम-छम नाचे बरखा रानी।।
हाथ-पाँव ह ठिठुर गे, देंह ह कँपकपावत हे।
मनखे मन के सादा दाँत ह किनकिनावत हे।।

सूक्खा नदिया, नरवा मन दउंड़ेला धरलिन।
खंचवा,डबरा,बांधा अउ तरिया मन भरगिन।।
डोलिया अउ बहरा के मुंही-पार ह भंगलागे।
कोंवर-कोंवर पाना दिखे रूख-राई हरियागे।।

मछरी मन नाचे लगिन, केकरा बाजा बजावय।
बिला के अहिरू, बिछरू सुनके जम्मों आवंय।।
घुरघुरा गरतुर बंसुरी बजाथे घपटे रात अँधियारी।
होली खेलत हें मेचका मन धरे हवंय पिचकारी।।

नांगर जोतागे खेत-खार, किसान के भाग जागे।
खुमरी पहिन के बनिहार, रोपा लगयेला आगे।।
चना, तिवरा के होरा अउ जोंधरी म पेट टन होगे।
आंसो सावन के झड़ी म सिरतोन मन मगन होगे।।

कवि- अशोक कुमार यादव मुंगेली, छत्तीसगढ़
जिलाध्यक्ष राष्ट्रीय कवि संगम इकाई।