
पहाड़ी के ऊपर बसे ग्रामो में नहीं है हैण्ड पम्प, पत्थरों के सीना चीरकर ग्रामीण कर रहे हैं पानी का इंतजाम।
अख्तर मेमन
मैनपुर :- गरियाबंद जिले के आदिवासी विकासखण्ड मैनपुर क्षेत्र में ग्रामीणों के घरो तक शुद्ध पानी पहुंचाने एक तरफ शासन प्रशासन ने लाखो करोड़ो रूपये जल जीवन मिशन के तहत राशि जारी किया है लेकिन आज भी पहाड़ी के ऊपर बसे विशेष पिछड़ी कमार जनजाति ग्रामो के ग्रामीणों को एक मटका-गंजी पीने के पानी के लिए झरिया में घंटो इंतजार करना पड़ता है।

तब कही जाकर उनके प्यास बूझ पाती है यह कोई नई बात नही है आजादी के पिछले 75 वर्षो से यहां निवास करने वाले ग्रामीणों के नसीब में कोई बदलाव नही हुआ है भले ही सरकार इन जनजातियों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के नाम पर आजादी के बाद से अब तक अरबो रूपये खर्च हो चुके होंगे पर न तो इनके हालात बदले है और न ही नसीब लेकिन इनके विकास के नाम पर व्यवस्था व सरकारी मिश्नरी से जुड़े लोगो के नसीब व हालात जरूर बदल जाते है और इसकी चर्चा होती है।

मैनपुर विकासखण्ड के दुरस्थ वनांचल पहाड़ी के ऊपर बसे ग्राम ताराझर, कुर्वापानी, मटाल, भालूपानी, डडईपानी में इन गर्मी के दिनों में लगातार पेयजल संकट गहराता जा रहा है ग्रामीण बूंद बूंद पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं गांव में एक भी हेण्डपंप नहीं होने के कारण, नदी नाले सूख गए है और विशेष पिछड़ी कमार आदिवासी जनजाति के लोग पहाड़ी के ऊपर पत्थरों के सीना चीरकर बूंद बूंद पानी एकत्र कर रहे हैं

तब कही जाकर एक हंडी पीने के लिए पानी बामुश्किल नसीब हो पा रही है वह भी गांव से लगभग 02 किमी दूर पैदल चलने के बाद पाहडी के ऊपर नदी नाले झरिया पोखर सब सुख जाने के कारण ग्रामीणों के द्वारा खोदे गए झरिया के आसपास वन्यप्राणीयों का डर बना रहता है क्योंकि वन्यप्राणी भी इसी झरिया में प्यास बुझाने पहुंचते हैं इसलिए ग्रामीण महिलाऐ समूह में झरिया पानी लेने जाते हैं और साथ में सुरक्षा की दृष्टि से पुरुष भी उनके साथ रहते हैं और वन्यप्राणियों से अपनी सुरक्षा के लिए पारंपरिक हथियार तीर धनुष लेकर जाते है ।

क्योंकि वन्यप्राणीयों का डर बना रहता है। 8 घंटे पैदल पगडंडी पहाड़ी रास्ते में चलने के बाद पहुंचा जाता है इन ग्रामो में मैनपुर से लगभग 24 किमी दूर ग्राम राजाडेरा है और वहां से 12 किमी पाहडी के ऊपर ग्राम ताराझर, कुर्वापानी, मटाल, भालूडिग्गी है इन ग्रामो तक पहुंचने के लिए कोई सड़क की व्यवस्था नहीं है पैदल 8 घंटे पगडंडी पत्थरीले खाई, गड्ढो और पेड़ पौधों को पकड़कर जान जोखिम में डालकर इन ग्रामो तक पहुंचा जाता है और यह ग्राम पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के गोदग्राम कुल्हाड़ीघाट के आश्रित ग्राम है जिसकी जनसंख्या 560 के आसपास है। गर्मी के दिनों में मवेशियों को अपने रिश्तेदारो के यहां पहाड़ी के नीचे गांव में ले आते है, इन ग्रामों के लोग पानी की कमी के चलते अपनी पालतू मवेशियों को अपने रिश्तेदारों या अपने परिचितों के यहां पाहडी के नीचे ओड़िशा और कुल्हाड़ीघाट के आसपास के गांव में छोड दिऐ है जो गर्मी बीतने के बाद बारिश के दिनों में वापस अपने मवेशियों को घर ले जाऐगे क्योकि गांव में ग्रामीणों को बमुश्किल पीने के पानी नसीब हो रहा है मवेशियों को कहा से मिलेगा। पीएचई विभाग द्वारा हर वर्ष सर्वे और टेंडर की बात कही जाती है। पीएचई विभाग द्वारा हर वर्ष पहाड़ी के ऊपर बसे इन ग्रामो में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए सर्वे के साथ टेंडर प्रक्रिया जारी करने की बात कही जाती है इस बात को जब ग्रामीणों से चर्चा किया जाये तो ग्रामीण गुस्से में नाराज हो जाते है। गांव में न स्कूल न बिजली न सड़क न स्वास्थ्य सुविधाएं पहाड़ी के ऊपर बसे इन ग्रामो में स्कूल भवन भी नही है झोपड़ी में पढ़ाई करते है बच्चे, बिजली नही लगी है सड़क नही है राशन गांव तक ले जाने के लिए घोड़े पाले हुए है ग्रामीण। क्या कहते है कुल्हाड़ीघाट के सरपंच कुल्हाडीघाट के सरपंच धनमोती बाई ने बताया कुल्हाडीघाट के आश्रित ग्राम ताराझर, मटाल, कूर्वापानी, भालूडिग्गी, डडईपानी जो पहाडी के उपर बसा हुआ है यहा इस गर्मी मे पेयजल की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है लोगो को झरिया खोदकर बूंद बूंद पानी के लिए मशक्कत करना पड रहा है।

क्या कहते हैं पीएचई के अधिकारी गरियाबंद पीएचई विभाग एसडीओ बी एस यादव ने बताया कुल्हाडीघाट के आश्रित ग्राम जो पाहडी के ऊपर बसा है जो भालूडिग्गी, मटाल, ताराझर, कुर्वापानी में पीएचई विभाग द्वारा पेयजल उपलब्ध कराने पूरा प्रयास किया जा रहा है विभाग का अमला इन गांवों में पहुंचकर पूरा सर्वे कर स्टिमेट तैयार किया गया है यहां डगबोर, हाथबोर से भी हैंड पंप खनन कर ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराई जाऐगी इसके लिए टेंडर प्रक्रिया जारी है।
