राजधानी रायपुर के नगर निकाय से अंतिम छोर बीजापुर में पदस्थापना से बदलाव व विकास की उम्मीद, लेकिन जमीनी समस्याएं बनी बड़ी चुनौती
ईश्वर सोनी बीजापुर
नवनियुक्त आईएएस विश्वदीप के बीजापुर कलेक्टर के रूप में पदभार संभालते ही जिले में उम्मीदों का नया माहौल बना है। नक्सल प्रभावित और भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण बीजापुर जिला लंबे समय से विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और आधारभूत सुविधाओं की समस्याओं से जूझता रहा है। ऐसे में अब लोगों की नजरें नए कलेक्टर पर टिक गई हैं कि वे इन गंभीर मुद्दों पर कितना प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर पाते हैं।
*विकास कार्यों पर करोड़ों खर्च, लेकिन गुणवत्ता पर लगातार उठे सवाल*
जिले में डीएमएफ, पीएमजीएसवाई सहित विभिन्न मदों से बड़े स्तर पर निर्माण कार्य लगातार जारी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में कई निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जिला मुख्यालय में ही हाल ही में बने निर्माणों में दरारें और घटिया सामग्री उपयोग के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों, भवनों और पुल-पुलियों की गुणवत्ता को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं।
विशेषकर पीएमजीएसवाई की अंदरूनी ग्रामीण सड़कों में खेतों की मिट्टी उपयोग होने के आरोपों के चलते बारिश के दौरान ग्रामीणों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में लोगों की मांग है कि नए कलेक्टर निर्माण कार्यों की उच्च स्तरीय जांच कर जिम्मेदारों पर कार्यवाही करें।
*स्वास्थ्य व्यवस्था मुख्यालय में ही बेहाल*
जिला मुख्यालय बीजापुर में ही स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति चरमराई हुई नजर आती है। डॉक्टरों की कमी, उपकरणों – दवाइयों व जांच की अनुपलब्धता और व्यवस्थागत कमजोरियों के कारण मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अंदरूनी क्षेत्रों की स्थिति और भी गंभीर बताई जा रही है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं तक प्रभावित हैं।
अब देखना होगा कि नए कलेक्टर स्वास्थ्य विभाग में समन्वय स्थापित कर व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।
*आश्रम और पोटाकेबिनों में शिक्षा व्यवस्था पर सवाल*
जिले के आश्रमों और पोटाकेबिनों में शिक्षा से लेकर खानपान और रहने की व्यवस्थाओं को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। कई अंदरूनी क्षेत्रों में शिक्षक नियमित रूप से स्कूल नहीं पहुंचते, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
आदिवासी अंचल में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक माना जा रहा है। साथ ही जिले में लंबे समय से दो-दो जिला शिक्षा अधिकारियों की पदस्थापना को लेकर भी चर्चा बनी हुई है। इस प्रशासनिक असमंजस पर नए कलेक्टर क्या निर्णय लेते हैं, इस पर भी सबकी नजर रहेगी।
*खेल अकादमी तो बनी, लेकिन सुविधाएं अधूरी*
बीजापुर में खेल प्रतिभाओं को आगे लाने के लिए खेल अकादमी तो बनाई गई, लेकिन खिलाड़ियों के लिए पर्याप्त संसाधन और सुविधाओं की कमी लगातार सामने आती रही है। खेल मैदान, प्रशिक्षकों और उपकरणों की कमी के कारण स्थानीय प्रतिभाओं को पूरा अवसर नहीं मिल पा रहा।
*आदिवासी संस्कृति और देवगुड़ी संरक्षण बड़ी जिम्मेदारी*
बीजापुर आदिवासी संस्कृति, परंपरा और देवगुड़ी की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। आधुनिक विकास के बीच आदिवासी परंपराओं और विधि-विधान को सुरक्षित रखना भी प्रशासन के सामने बड़ी जिम्मेदारी होगी। स्थानीय समाज चाहता है कि विकास के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक पहचान भी संरक्षित रहे।
*वनोपज से आदिवासियों को लाभ दिलाने की चुनौती*
टोरा, महुआ, अमचूर, तीखुर, चिरौंजी और इमली जैसी वनोपज बीजापुर की पहचान हैं, लेकिन आज भी आदिवासी ग्रामीणों को इन उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। यदि इन उत्पादों की ब्रांडिंग और प्रोसेसिंग को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा मिले तो बीजापुर आर्थिक रूप से मजबूत हो सकता है।
लोगों की अपेक्षा है कि नए कलेक्टर वनोपज आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में ठोस रणनीति तैयार करेंगे।
*नक्सलवाद के बाद पर्यटन विकास की बड़ी संभावना*
बीजापुर में मट्टीमरका, नम्बी, भद्रकाली संगम और नीलम सरई वॉटरफॉल जैसे प्राकृतिक पर्यटन स्थल मौजूद हैं।
नक्सलवाद कमजोर पड़ने के बाद अब इन क्षेत्रों में पर्यटन विकास की संभावनाएं तेजी से बढ़ी हैं।
यदि प्रशासन बुनियादी सुविधाओं और प्रचार-प्रसार पर ध्यान दे तो बीजापुर राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बना सकता है।
*मनरेगा में मशीनों का उपयोग, बढ़ता पलायन*
मनरेगा कार्यों में मशीनों के उपयोग के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि मजदूरों की जगह मशीनों से काम कराया जाएगा तो स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा और वे मजदूरी के लिए पड़ोसी राज्यों की ओर पलायन करते रहेंगे।
अब सवाल यह है कि नए कलेक्टर मनरेगा में पारदर्शिता और स्थानीय रोजगार सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
*डीएमएफ और निर्माण मदो के कार्यों में कमीशनखोरी की चर्चाएं तेज*
जिले में लंबे समय से यह चर्चा जोरों पर रही कि कलेक्टर की कुर्सी से कुछ ही दूरी पर डीएमएफ और अन्य निर्माण मदो के कार्यों में कथित कमीशनखोरी का खेल चलता रहा। चर्चाओं के अनुसार डिप्टी कलेक्टर और बाबू स्तर पर बिना तत्कालीन कलेक्टर की जानकारी के कथित रूप से काम बांटने और आईएएस अधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर कर निर्माण कार्यो के As जारी करने जैसी गंभीर आरोप की बातें सामने आती रहीं।
अब जिलेभर में चर्चा है कि क्या नए कलेक्टर अपने कार्यालय में चल रहे इस कथित नेटवर्क पर लगाम लगाने में सफल होंगे और प्रशासनिक पारदर्शिता स्थापित कर पाएंगे।
*मुख्यालय से अंदरूनी क्षेत्रों तक विकास की बड़ी चुनौती*
बीजापुर जैसे संवेदनशील जिले में केवल जिला मुख्यालय ही नहीं बल्कि अंदरूनी गांवों तक विकास पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पेयजल और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं को अंतिम छोर तक पहुंचाना प्रशासन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
अब जिले की जनता को उम्मीद है कि नए कलेक्टर केवल फाइलों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर सक्रियता दिखाएंगे और बीजापुर को विकास, पारदर्शिता और सुशासन की नई दिशा देंगे।
*नवनियुक्त कलेक्टर के सामने धर्मांतरण पर लगाम सबसे बड़ी चुनौती*
नवनियुक्त कलेक्टर के सामने जिले में विकास कार्यों की निगरानी के साथ-साथ धर्मांतरण के बढ़ते मामलों पर नियंत्रण भी बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। जिले के अंदरूनी आदिवासी इलाकों में लंबे समय से भोले-भाले ग्रामीणों को प्रलोभन, सहायता और विभिन्न माध्यमों के जरिए धर्म परिवर्तन कराने की चर्चाएं लगातार सामने आती रही हैं।
स्थिति यह है कि जिला मुख्यालय के आसपास में ही सैकड़ो चर्च स्थापित हो चुके हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक निगरानी कमजोर होने के कारण यह गतिविधियां लगातार बढ़ती गईं। अब लोगों की नजर नवनियुक्त कलेक्टर पर टिकी है कि वे इस संवेदनशील विषय पर किस प्रकार संतुलित और कानूनी कार्रवाई करते हैं।
वहीं प्रशासन के सामने यह चुनौती भी होगी कि जिले में संचालित धार्मिक संस्थाओं, चर्च निर्माण और बाहरी फंडिंग से जुड़ी गतिविधियों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए। साथ ही किसी भी समुदाय के बीच तनाव की स्थिति न बने, इसका संतुलन बनाए रखना भी अहम होगा।
*सरकारी राशन की हेराफेरी , ग्रामीणों तक पंहुचने से पहले ही गायब*
ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं कि गरीबों के लिए आने वाला चना, चावल और अन्य खाद्यान्न जरूरतमंदों तक पहुंचने से पहले ही बाजारों में खपाया जा रहा है।
आरोप हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में निगरानी की कमी और स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के कारण राशन की हेराफेरी लंबे समय से जारी है। कई गांवों में हितग्राहियों को पूरा राशन नहीं मिलने, वितरण में कटौती और रिकॉर्ड में गड़बड़ी जैसी शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन सख्त निगरानी, नियमित जांच और परिवहन व्यवस्था की मॉनिटरिंग सुनिश्चित करे तो बड़े स्तर पर हो रही इस गड़बड़ी पर रोक लगाई जा सकती है। राशन दुकानों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन, GPS आधारित ट्रैकिंग और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई जैसे कदम प्रभावी साबित हो सकते हैं।
इसके अलावा गांव स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण, ग्राम समितियों की भागीदारी और हितग्राहियों की सूची सार्वजनिक करने की मांग भी उठ रही है ताकि गरीबों के हक का राशन बीच रास्ते में गायब न हो। अब लोगों की नजर नवनियुक्त कलेक्टर पर टिकी है कि वे इस व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए कितनी सख्ती दिखाते हैं।
