जांजगीर-चांपा – जैसे जाने या अनजाने में ईंधन से अग्नि का स्पर्श हो जाये तो वह भस्म हो ही जाता हैं , वैसे ही जान बूझकर या अनजाने में भगवान के नामों का संकीर्तन करने से मनुष्य के सारे पाप भस्म हो जाते हैं । जैसे कोई परम शक्तिशाली अमृत को उसका गुण ना जान कर अनजाने में पी ले , तो भी अमृत उसे अमर बना ही देता हैं , वैसे ही अनजाने में उच्चारण करने पर भी भगवान का नाम अपना फल देकर ही रहता हैं। बड़े से बड़े पापों का सर्वोत्तम , अंतिम और पाप वासनाओं को भी निर्मूल कर डालने वाला प्रायश्चित यही हैं कि केवल श्रीभगवान के गुणों , लीलाओं और नामों का कीर्तन किया जाये । उक्त उद्गार गोलोकवासी श्रीमति आशा द्विवेदी की स्मृति में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महात्म्य के चतुर्थ दिवस अंचल के सुप्रसिद्ध भागवताचार्य पंड़ित दिनेश कुमार दुबे पुरगांव वाले ने कही । मुख्य यजमान दंपत्ति श्रीमति श्वेता द्विवेदी जयप्रकाश द्विवेदी हैं ।
दुष्कर्मों में लिप्त अजामिल भगवान के पार्षदों के साथ स्वर्णमय विमान पर सवार होकर बैकुंठ लोक चले गए । श्रद्घेय दुबे जी ने अजामिल की कथा में बताया कि वह एक ब्राह्मण था जो शास्त्रज्ञ , शील , सदाचार और सद गुणों में निपुण था लेकिन वह भी माया के जाल में आकर अपने धर्म से भटक गया । अजामिल कान्यकुब्ज ब्राह्माण कुल में जन्में और कर्म कांड़ी थे । एक दिन वे नर्तकी वेश्या को अपने घर ले आये और उसकी इच्छाओं को पूरा करने के लिये धन प्राप्ति के उद्देश्य से वह तरह-तरह के दुष्कर्मों में लिप्त हो गया । इस तरह से अजामिल को नौ पुत्र प्राप्त हुआ तथा दसवीं संतान उसके गर्भ में थी । कुछ समय पश्चात एक दिन संतों का एक काफिला अजामिल के गांव से गुजर रहा था तो शाम होने पर संतों ने अजामिल के घर के सामने डेरा जमा दिया । अगले दिन साधुओं ने अजामिल से दक्षिणा मांगते हुए कहा कि हमें रुपया पैसा नहीं चाहिये बल्कि अपने होने वाले पुत्र का नाम तुम नारायण रख लो , बस यही हमारी दक्षिणा हैं । अजामिल की पत्नी को पुत्र पैदा हुआ तो अजामिल ने उसका नाम नारायण रख लिया और नारायण से प्रेम करने लगा । इसके बाद जब अजामिल का अंत समय आया तो उसे अति भयानक यमदूत दिखलाई पड़े । भय और मोह वश अजामिल अत्यंत व्याकुल और दु:खी होकर नारायण ! नारायण! ! पुकारा !!! भगवान का नाम सुनते ही विष्णु पार्षद उसी समय उसी स्थान पर दौड़कर आ गये। यमदूतों ने जिस पाश से अजामिल को बांधा था , पार्षदों ने उसे तोड़ डाला । यमदूतों के पूछने पर पार्षदों ने धर्म का रहस्य समझाया , यमदूत नहीं माने और वे अजामिल को पापी समझकर अपने साथ ले जाना चाहते थे । तब पार्षदों ने यमदूतों को डांटकर वहां से भगा दिया और अजामिल तत्काल भगवान के पार्षदों के साथ स्वर्णमय विमान पर आरूढ़ होकर आकाश मार्ग से भगवान लक्ष्मीपति के निवास स्थान बैकुंठ को चले गए ।
कथा श्रवण करने डॉ रविंद्र द्विवेदी संग शशिभूषण सोनी पहुंचे । उन्होंने आचार्य श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।
इसी तरह से भक्त प्रहलाद-चरित्र का वर्णन करते हुए भागवताचार्य ने कहा कि भक्त प्रहलाद को अपने पिता हिरण्याकश्यप ने केवल अपना ही नाम लेने को कहा और भगवान के नाम का विरोध किया । परन्तु प्रहलाद ने भगवान का नाम नही छोड़ा इससे क्रोधित होकर हिरण्या कश्यप ने प्रहलाद को मारने के अनेक प्रयत्न किये जैसे उसे पहाड़ों से गिराया, सांपों से डसवाया, हाथी से कुचलवाया और अन्त में होलिका के संग जलाया । परन्तु जिसका रक्षक स्वयं भगवान होते हैं उनका कोई कुछ भी बिगाड़ नही सकता । अंत में प्रहलाद के द्वारा हर जगह भगवान हैं कहने की बात पर हिरण्यकश्यप ने गंदा से खंभे पर प्रहार कर दिया और उससे ही नरसिंह भगवान प्रकट हो गए । अंत में उन्होंने क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया । कथा श्रवण करने पंडित अरविंद तिवारी, डॉ रमाकांत सोनी , डॉ रविंद्र कुमार द्विवेदी, शशिभूषण सोनी, उपेंद्र धर दीवान सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त पहुंच रहे हैं ।

धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए ।
समुद्र मंथन कथा श्रवण कराते हुए अंचल के प्रसिद्ध कथावाचक ने कहा एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन यानी धन, वैभव और ऐश्वर्य से विहीन हो गया था. तब विष्णु जी ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन का उपाय बताते हुए कहा कि समुद्र मंथन से जो अमृत कलश प्राप्त होगा , उससे आप सभी अमर हो जायेंगे। इसके बाद वासुकी नाग की नेती बनाई गई और मंदा चल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथा गया। इसके बाद एक-एक कर समुद्र से कुल 14 चीजें निकलीं ,जिनका बंटवारा देवताओं और असुरों के बीच किया गया । मंथन के दौरान हला-हल नामक घातक विष भी समुद्र से निकला , जिसे भगवान शिव ने दूसरों को बचाने के लिये पी लिया । मंथन के अंत में धन्वंतरि ( चिकित्सा के देवता ) पवित्र अमृत कलश लेकर प्रकट हुए , अमृत निकलते ही राक्षसों ने उसे जबरदस्ती छीन लिया जिसके बाद देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ ।
अमृत का संसर्ग ना होने के कारण सिर धड़ से अलग हो गया ।
अंत में मोहिनी ( नर्तकी ) का वेश धारण कर विष्णु देवताओं को अमृत पिला रहे थे उसी समय छाया-पुत्र राहु नामक दैत्य देवताओं का भेष बनाकर उनके बीच में आ बैठा और देवताओं के साथ उसने भी अमृत पी लिया । परंतु चंद्रमा और सूर्य ने उसकी पहचान कर ली और भगवान विष्णु को इसके बारे में बता दिया । अमृत पिलाते-पिलाते ही भगवान ने अपने चक्र से उसका सिर काट डाला । अमृत का संसर्ग ना होने के कारण उसका धड़ नीचे गिर गया परंतु सिर अमर हो गया और ब्रह्मा जी ने उसे ग्रह बना दिया । जब देवताओं ने अमृत पी लिया तब भगवान ने बड़े-बड़े दैत्यों के सामने ही मोहिनी रूप त्यागकर अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया । जब असुरों ने देखा कि देवताओं को तो अमृत पिला दिया गया हैं लेकिन उन्हें अमृत नहीं मिला हैं तो उन्होंने अपने हथियार उठा लिये और देवताओं पर आक्रमण कर दिया । इधर देवताओं ने एक तो अमृत पीकर विशेष शक्ति प्राप्त कर ली थी और दूसरे उन्हें भगवान का आश्रय प्राप्त था जिसके प्रभाव में आकर वे असुरों से युद्ध करने लगे । क्षीर सागर के तट पर अत्यंत भयंकर संग्राम हुआ । देवताओं और दैत्यों की वह लड़ाई ही देवासुर संग्राम के नाम से जानी जाती हैं । देवासुर संग्राम में इंद्र ने असुरों को पराजित किया और स्वर्ग लोक को वापस ले लिया ।
