वर्षो से विराजित है इमली के पेड़ में माँ चिरकुटहिन
फटा कपड़ा अथवा साड़ी का पल्लू फाड़कर बांधने की है परम्परा

जामगांव:- ग्राम जामगांव से 2 किलोमीटर दूर कनेकेरा गाँव के पास आज भी चिरकुटहीन दाई माता के रूप में साक्षात विराजमान हैं,फिंगेश्वर महासमुंद मुख्य मार्ग पर स्थित इमली के झाड़ पर माता आज भी साक्षात रूप में विद्यमान है जहा पर भक्तगण के द्वारा फटा हुआ कपड़ा या साड़ी की पल्लू अथवा धागा एवं चूडी चढ़ाने की परंपरा है,यह परंपरा विगत सौ सालों से चली आ रही है जो कि आज भी कायम है। हरिभूमि के प्रतिनिधि ने जब इस किवदंती के विषय मे पड़ताल कि तो जामगांव कनेकेरा निवासी दशरथ सिन्हा, मिन्जून साहू एवं जेठूराम निषाद ने बताया कि एक बार उनके गाँव में बाहर से रिश्तेदार आया हुआ था और वे उसी रास्ते से आये थे जहा पर माता चिरकुटहिन इमली के पेड़ में विराजमान है,उनके साथ उनका छोटा दुधमुंहा बच्चा भी साथ मे था,दिन में तो जैसे तैसे वह बच्चा ठीक था और खेल रहा था लेकिन शाम होते ही अचानक वह दुधमुंहा बच्चा जोर जोर से रोना चालू कर दिया, उस बच्चे का झाड़ फूँक के साथ ही सभी प्रकार से डॉक्टरों के द्वारा इलाज भी किया गया परन्तु उस बच्चे का रोना ठीक ही नहीं हुआ तो ग्राम के बैगा से सलाह लेकर उस परिवार के द्वारा जहाँ पर माता चिरकुटहिन इमली के झाड़ में विराजित है उस झाड़ के डंगाल में फटा कपड़ा बांधा गया और चूड़ी चढ़ाया गया तब कही जाकर उस बच्चे का रोना ठीक हो पाया। आज भी माताऐ अपने दुधमुंहे बच्चे के साथ जब भी इस रास्ते से गुजरती हैं तो वे चूड़ी और फटा कपड़ा या अपनी साड़ी के पल्लू को फाड़कर जरूर चढ़ाते है, साथ ही अपने बच्चे की खुशहाली की कामना भी माताजी से करती है।
