तुम निर्भय हो चलो अकेला

तुम निर्भय हो चलो अकेला
मैने जग में सब कुछ झेला
दुख,में जो भी काम न आया
वही रह गया निपट अकेला

हो मनुष्य संकट से बचना
तम से लड़ प्रकाश फैलाना
पशु-पक्षी की जान बचाने
जंगल को है और बढ़ाना

दुनिया है दुख-सुख का खेला
तुम निर्भय हो चलो अकेला

रवि की तरह बनोगे कैसे
दीपके जैसे तुमको जलना
अपना चोट भुलाकर,लोगों
की घावों पर मरहम मलना

पाप पुण्य का है यह मेला
तुम निर्भय हो चलो अकेला

जीवन में नव पुष्प खिलाकर
पुष्पों सा सुगंध देना है
जो मालिक ने हमें दे दिया
उसको हँस कर ही लेना है

यहाँ न तेरा पाई-धेला
तुम निर्भय हो चलो अकेला

– गौरव राठौर
जाँजगीर छ.ग.