प्रमोद दुबे
महासमुंद :– संपत्ति स्वप्न के समान, जवानी युवा अवस्था फूल के समान और जीवन बिजली के चमक के समान होता है। इसलिए संपत्ति, जवानी और जीवन का कभी भी अभिमान नही करना चाहिए। कब अंधेरा हो जाए, इसका क्या भरोसा। स्थानीय लालवानी गली में चल रहे श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के अंतर्गत सिंधू नरेश और जड़ भरत की कथा का बखान करते हुए पं. पंकज तिवारी ने कहा कि भगवत प्राप्ति के लिए दया और संतुष्टि के भाव के साथ इंद्रियों को वश में करना चाहिए। इन तीनों कर्म से भगवान प्रसन्न होते हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन तब तक निर्थक रहता है जब तक किसी का कल्याण नहीं करता। भगवान वेदव्यास द्वारा लिखे गए 18 पुराणों का सार ही मनुष्य को बोध कराने के लिए है। परोपकार करने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है और पाप कर्म का नाश होता है। जिनके ज्यादा संबंधी होते है वह ज्यादा परेशान होता है इसलिए जब चक्रवर्ती सम्राट भरत राजपाठ का त्यागकर वन में तपस्या करने चले गए किंतु एक मृग के मोह फंसकर अंत समय में मृग का ही ध्यान करते रहे जिसके कारण उसे मृग योनी प्राप्त हुई। मृग योनि में उसे पूर्व जन्म का ज्ञान था जिसके कारण एकादशी व्रत के समय वह केवल सुखे पत्ते का ही सेवन करता था क्योंकि हरे घास में छोटे-छोटे जीव-जंतू होने से पाप का भय था। मृग योनि में किए गए पुण्य फल के कारण उनका अलगा जन्म ब्राम्हण कुल में हुआ।
इस जन्म में भी उन्हें पूर्व जन्मों का ज्ञान था इसलिए वे किसी से बात नहीं करते थे जिसके कारण उसे जड़ भरत कहा जाने लगा। जब वह खेत जाता तो सभी में वह भगवान का रूप देखता जिसके कारण कोई भी जानवर खेत को नुकसान करने पहुंचा तो वह उसे भगाने के बजाए खाने देता था। एक दिन भील राजा के यहा पुत्र जन्म हुआ तो उसके सेवक नरबलि देने के लिए जड़ भरत को खरीदकर ले गए। जब बलि देने का समय आया तो वह मां भद्रकाली को प्रणाम कर यह कामना किया कि जिस मां के आंचल में वह पला है उसी मां के सामने अंतिम समय में विदा ले रहा है और वह मा भ्रदकाली का आभार व्यक्त करने लगा। जब राजा उसे मारने पहुंचा तो मां भद्रकाली भील राजा पर कुपित हो। गया। महराज जी ने बताया कि वहां से वह आगे जा रहा था कि रास्ते में सिंधू नरेश की पालकी जा रही थी। राज की सेवक उसे पालको उठाने के लिए ले गए। नया होने के कारण असंतुलन हुआ और राजा नाराज होकर जड़ भरत को मारने दौड़ा इस पर उसके मन में विचार आया कि मनुष्य जीवन में कुछ नहीं किया हूं के भाव से राजा को रोका और उनसे धर्मज्ञान की बात करने लगा। इस पर राजा आश्चर्यचकित होकर उनसे पूछा कि आप कौन हो, तो उन्होंने सिंधू नरेश से पूछा कि इस भारत वर्ष का नाम कैसे पड़ा इस पर उन्होंने बताया कि भारत वर्ष का प्राचीन नाम अजनाम वर्ष था, लेकिन एक चक्रवर्ती राजा भरत हुआ जिनके त्याग, तपस्या के कारण उनके नाम से इस देश का नाम भारत वर्ष पड़ा है। इस पर कहा कि जिसके नाम से यह देश है मैं वहीं भरत हूं।
