एसी कूलर काम आय ना, कलकुत माते हे भारी।
तर तर तर तर चुहय पसीना, गरमी अब्बड़ ए दारी।।
अमृत जइसन लागय संगी, माटी करसी के पानी।
नून संग चटनी अउ बासी, संग गोंदली के चानी।।
झाँय झाँय मँझनी हा करथे, सुस्ती हा रहिथे छाये।
छटपट छैय्या माते रहिथे, नइ तो कछु मन ला भाये।।
सुरता अब्बड़ मोला आथे, लइका राहन ते घानी।
ठाड़ मँझनिया पीये जावन,अम्मठ अमली के पानी।
दस पइसा के बरफ बिसावन, रंग रहय आनी बानी।
कोसा लावन हेर हेर के, अब के लइका का जानी।।
उमाकान्त टैगोर
कन्हाईबंद, जाँजगीर (छ.ग.)
