उसनत बिरहा के आगी–


——///—–///——
जेठ आषाढ़ के गरमी जइसन,
उसनत बिरहा के आगी रे|
मन के कलपना कोन ल सुनावंव,
कोन ह बनहि मोर रागी रे||

जेठ-आषाढ़ के महिना म,
जइसन टोटा ह नंगत सुखाथे|
तोर सुरता जब आथे बैरी,
देख मोर अक्कल ह हजाथे||
जइसन कोनो घीव ल डारे,
चूल्हा के धधकत आगी रे–

जेठ के तपत घाम म संगी,
तन-मन खोजे जुड़ छाँव रे|
वैसनेच बिरहा म तड़फत,
खोजंव तोर अंछरा के छाँव रे||
मोर जिनगानी अइसन लागे,
जस जंगल म लगे हे आगी रे-

जइसन गरमी के लगते म,
पतझड़ आ जथे बहार म|
वैसनेच मोर जिनगी ह लागे,
देख तो कारी तोर प्यार म||
का कहिके तोला समझावंव,
कतका पिरित ह लागी रे–

आस लगा के बदरा देखंव,
तेहा कब बरसाबे पानी रे|
मया के धरती बंजर होहि,
त कैसे चलही जिनगानी रे||
प्रेम नगरिया म काबर तेहा,
बनके,सुरूज लगाए आगी रे–
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद (छ. ग.)