*23 मार्च शहादत दिवस*
*शहादत के 90 वर्ष और शहीदों के सपनों का भारत*
शहीदे आजम भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव के शहादत को 90 साल हो गए और इन 90 सालों में शहीदों के सपनों का भारत बनना आज भी बाकी है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ते हुए शहीदे आजम भगत सिंह ने कहा था कि गोरे अंग्रेज तो भारत से चले जायेंगे लेकिन क्या काले भारतीय पूंजीपतियों की गुलामी पसन्द करेंगे। जहाँ चंद पूंजीपति लोग मेहनतकश मजदूरों और किसानों का शोषण जारी रखेंगे। उन्होंने क्रांति का परिभाषा बताते हुए कहा था कि “क्रांति से हमारा अभिप्राय किसी का खून बहाने से नहीं है बल्कि इस शोषणकारी व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन से है।”
23 मार्च के दिन भगतसिंह की विचारों को मानने वालों के अलावा शहीदों के याद में श्रद्धांजलि सभा, स्मरण के नाम पर वे लोग भी रस्म आदायगी करते हैं जो भगतसिंह के आमूल चूल व्यवस्था परिवर्तन के विरुद्ध हैं। भगतसिंह ने अपनी छोटी सी उम्र में धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास, रूढ़िवाद पाखंड के खिलाफ युवाओं, किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, महिलाओं को अपनी मुक्ति की संघर्ष में एकजुट होने का आह्वान किया था।
आज के संदर्भ में हम पाते हैं कि शहीदों का सपना आज भी अधूरा है। उपनिवेशिक गुलामी के दौरान ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सबसे बड़े दलाल ,देश के भीतर पल रहे संघी साम्प्रदायिक फासीवादी ताकतों ने 2014 के बाद और ज्यादा आक्रामक होते हुए आम जनता के सामने विकराल संकट पैदा किया है। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, महिलाओं के ऊपर उत्पीड़न, शोषण, दमन, अत्याचार दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहा है। केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा बैंक, बीमा, रेल, शिक्षण संस्थान, स्वास्थ्य, एयरपोर्ट, सड़क जैसे तमाम सार्वजनिक संस्थानों को अडानी-अम्बानी जैसे बड़े उद्योगपतियों, कॉरपोरेट घरानों के हाथों कौड़ी के दाम बेचा जा रहा है। रोजगार के अवसर को समाप्त कर दिया गया है। और अब भारत की रीढ़ कहे जाने वाली कृषि क्षेत्र को कॉरपोरेट घरानों के हाथों में देने के लिए कृषि कानूनों के जरिये किसानों के मौत का फरमान जारी कर दिया है। जिसके खिलाफ किसान पिछले 9 महीने से लगातार आंदोलनरत हैं वही चार महीने से दिल्ली की सीमाओं के राष्ट्रीय राजमार्गों पर आंदोलन में डटे हुए हैं। किसान आंदोलन को बदनाम करने सरकार की ओर से किसानों को खालिस्तानी,माओवादी, पाकिस्तानी, आतंकवादी जैसे शब्दों से नवाजा गया, किसान नेताओ के पीछे राष्ट्रीय जांच एजेंसी लगाकर उन्हें डराया, धमकाया गया। ठीक उसी तरह जैसे अंग्रेजी हुकूमत ने शहीदे आजम भगतसिंह और उनके साथियों को आतंकवादी कहा था। आज भाजपा आरएसएस की संघी फासीवादी सरकार द्वारा किसान नेताओं व सामाजिक, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया जा रहा है। 1907 में अंग्रेजों ने पंजाब भूमि उपनिवेशण अधिनियम पारित किया था जिसके विरूद्ध शहीदे आजम भगतसिंह के चाचा अजित सिंह के नेतृत्व में “पगड़ी संभाल जट्टा” आंदोलन हुआ था। (यहाँ जट्टा का आशय किसान से है) जो करीब आठ महीने तक चला और मजबूर होकर अंग्रेजों को वह कानून वापस लेना पड़ा। अंग्रेजों से माफी मांगने और देशभक्त क्रांतिकारियों की जासूसी करने वाले आरएसएस के मार्गदर्शन वाली पार्टी की मोदी सरकार , एक बार पुनः अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी की तर्ज पर देशी विदेशी कॉरपोरेटों की गुलामी कर रही है।
आज जारी किसान आंदोलन केवल कृषि कानूनों तक ही सीमित नहीं है। यह आंदोलन जन आंदोलन का स्वरूप ले चुका है। क्योंकि यह जितना किसान और कृषि विरोधी है उतना ही आम उपभोक्ता विरोधी है क्योंकि इस कानून से किसान अपनी जमीन और फसल से वंचित तो हो ही जायेंगे खाद्यान्नों की जमाखोरी, कालाबाजारी, महंगाई और भी ज्यादा बढ़ेगी। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सरकार की पेट्रोलियम मंत्रालय जरूर है लेकिन पेट्रोल डीजल की मनमाने दाम पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। वैसे भी जमाखोरी, कालाबाजारी का दंश देश की जनता ने कोरोना काल मे देख लिया है जहाँ 10 रुपये किलो का नमक 100 रुपये किलो और 5 रुपये का एक गुड़ाखु डिबिया 100 रुपये तक बिका है। यही हाल दाल, चावल, प्याज ,आलू, तेल आदि दैनिक जीवन की वस्तुओं की होगी तो आम जनता का क्या होगा। इसलिए यह आंदोलन व्यापक रूप से कॉरपोरेट राज व फॉसिस्टों के खिलाफ छिड़ चुकी है क्योंकि जनता देख रही है चुनाव में चेहरा बदलता है लेकिन व्यवस्था वही लुटेरी ही रहती है। सरकारों को पूरी तौर से नियंत्रित कॉरपोरेट ही करते हैं।
आओ 23 मार्च 2021 के दिन शहीदों के सपनों को साकार करने जारी ऐतिहासिक किसान आंदोलन में एकजुटता कायम करना शहीदे आजम भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
