विषय-स्पर्श कर सकूं रूह को
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कुविचार को तजकर सारे
चिंतन की कोई नई रीत दें
समर्पित होकर उकेर सकूं
दुख तकलीफ़ व जन की पीड़ा।
शब्दों में मायूसी कभी न भरना
खोखली रिवाजों में न समेटना
अंतर्मन के हर द्वंद निकलें
चुनिंदा कुछ एहसास हमें देना।
कोरी ही रह जाएं न कल्पना
खुशियों की बेशुमार मोती देना
व्याकुलता मिट जाएं सभी
श्रृंगारित इतनी कविता कर देना।
छंद रस व अलंकार न जानूं
अर्थं को तुम अनर्थ न करना
संयम की सीमा न पार करूं
शील गुण व धर्म की मार्ग देना।
खामोशी मेरी कहती हैं क्या?
कागज पर सब बयां कर देना
भावनाओं की स्याही सूखें न
प्रेम की गहराई अथाह भर देना।
रुके न ये सृजन का सिलसिला
सरोज बन यूं ही सुशोभित रहूं
जीवन के शांत सरोवर में सदा
शब्दकोश उर में निर्मित करना।।
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प्रेषक,
कवयित्री
सरोज कंसारी
नवापारा राजिम
जिला-रायपुर (छ. ग)
