कविता
सिर्फ़ सुनी सड़को पर ही नहीं
भीड़ में भी तो दरिंदगी होती हैं,
मानवता अब मर चुकी हैं शायद
सरेआम बेटी लहू लुहान होती हैं।
चिख कराह दर्द सुनते नहीं कोई
देखकर दृश्य आत्मा रो उठी हैं,
महफूज़ नहीं कहीं कोई कली
बेरहमी से वो क्यूं रौंदी जाती हैं?
कानून के हाथ लंबे होते हैं बेशक
सिर्फ़ कागजी कार्यवाही होती हैं,
हर दिन वहसी दरिंदो की देखों
वासना की शिकार बेटी होती हैं।
झूठ-लोभ मद-माया का जाल हैं
इंसानियत का न नामोनिशान हैं,
बढ़ते नहीं कदम मदद के लिए
चर्चे और सवाल ही हजार हैं।
केंडिल जला फिर दिखावे क्यूं?
खुलेआम जब दरिंदे घूमते है,
बिना कसूर के सजा वो पाती हैं
कसूरवार दौलत से छूट जाते हैं।
रूह कांप जाती हैं देख घटना
तब भी क्यूं जनता मौन होती हैं?
बेवजह बाद में बवाल मचाते हैं
हर बार किस्से वहीं दोहराते हैं।
अखबारों में सिर्फ़ छपाई जाती हैं
कब तक टूटती बिखरती रहेगी वो,
क्या जवाब हैं किसी के पास?
यूं बैठे रहेंगे हम लिए हाथो में हाथ।
बढ़ते ही जा रहे हैं हौसले दुष्टों के
कब मिलेगी मुक्ति इन जानवरों से?
हर चौक-चौराहे में क्यूं बनती नही
इक कठोर अदालत जनता की।
रोंगटे खड़े करने वाली सजा मिले
हवस के इन भूखे जानवरों को,
अब न जागे तो मिटती रहेगी हस्ती
मासूम नाजुक पापा के परियो की।
बेशर्मी की हद पार कर दी तुमने
तड़पकर वो पुकारती रहीं तुम्हें,
जख्मों पर नमक छिड़कते रहें तुम
धिक्कार हैं विडियो बनाते रहें तुम।।
प्रेषक,
कवयित्री
सरोज कंसारी
नवापारा राजिम
जिला-रायपुर (छ. ग.)
मो.-9131154880
