परदेशिया संस्कृति——
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ये परदेशिया संस्कृति ह,कहाँ ले आके झपागे|
मया पिरित के जगा म,वेलेनटाइन डे ह आगे||
जनम देवैया दाई- ददा ल,काबर तै भुलागेस|
मीठलबरा के चक्कर म,काबर तैहा आगेस||
लोक-लाज अऊ मर्यादा,न जाने कहाँ गँवागे–
चिरहा-फटहा कपड़ा पहिरे,तेहा मटमटाए|
दाई-ददा के इज्जत ल,काबर तै बट्टा लगाए||
वेलेनटाइन डे के चक्कर म,तेहा कैसे आगे—
छोड़ छाड़ के चलदेस काबर,ते जम्मो रिलेशन|
ये कइसन के सभ्यता,हाबस लिव इन रिलेशन||
श्रद्धा के अंजाम ल देख,पैंतीस टुकड़ा म कटागे-
चुंदी बगराये बही बरन,नाखून जइसन शुर्पनखा|
काम वासना म जिनगी रंगे,दूसर के देखी देखा||
मंदिर देवाला घलो नि छोड़े,सबके मति बौरागे–
दाई ददा के पूजा करले,इही जीवन के उपासना|
देखत जवानी उतर जही,काम नी आवे वासना||
चरदिनिया प्यार के का औकात परिवार के आगे-
रचनाकार :- श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद (छ.ग.)

