मुख्यमंच पर चौथे दिन दूधमोंगरा के कलाकरों की शानदारी प्रस्तुति।

राजिम। माघी पुन्नी मेला के चौथे दिन मुख्य मंच पर छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक बिखेरने के लिए हमारे छत्तीसगढ़ी पंडवानी गायिका पद्मश्री उषा बारले ने कपालिका शैली में कुन्ती और गंधारी के बीच के संवादों को अपने अंदाज पर प्रस्तुति दी। उनकी हाव भाव को देखकर दर्शक भी मंच से बंधे रहे। उनकी इस अंदाज को देख कर बड़े बुजुर्ग दर्शक अपने बच्चे को पंडवानी की शैली से अवगत करा रहे थे। पंडवानी के समाप्ति पर सभी ने जोरदार तालियों से पद्मश्री उषा बारले का स्वागत किया। कार्यक्रम के दूसरे चरण में टिकेन्द्र वर्मा की प्रस्तुति रही जिसमें गणपति ल मनाओं… के पश्चात माँ जगत जननी को मनाने के लिए मंच पर जय माँ काली जय छत्तीसगढ़ महतारी… गीत की प्रस्तुति दी। इसके बाद जादू डारे अलबेरी नार की प्रस्तुति से दर्शकों को खुब आनंदित किया।

लोक कलामंच के अंतिम प्रस्तुति छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध त्यौहार छेरछेरा की प्रस्तुति दी। सांस्कृतिक मंच पर कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध दूध मोंगरा के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति गणेश वंदना के साथ शुरूआत हुई। इसके बाद क्रमशः जय-जय हे दुर्गा माता, जय छत्तीसगढ़ महतारी… के पश्चात थईया-थईया नाचे मोर अंगना… जस गीत गाकर महौल भक्तिमय बना दिया। इसी के साथ बईगा जाति के द्वारा गायी जाने वाली गीत महुआ के लाटा, कोलार भाजी…. गीत की प्रस्तुति दी।

कलाकरों की प्रस्तुति देख दर्शक भी अपने जगहों पर खुद झूमने लगे। अगली कड़ी में पंथी गीत की प्रस्तुति दी। इसके बाद दूध मोंगरा का सबसे प्रसिद्ध गीत जिसे 1976 में गायी गयी गीत ‘कनिहा म करधन अउ पांव म सांटी’ की शानदार प्रस्तति दी। दूध मोंगरा लोकमंच के द्वारा छत्तीसगढ़ के विभिन्न सांस्कृतिक परम्पराओं को मंच पर नृत्य और गीत के माध्यम से ऐसी प्रस्तुति दी जिसे देख दर्शक को भी अहसास हुआ कि राजिम माघी पुन्नी मेला का ये विशाल मंच वास्तव में छत्तीसगढ़ी संस्कृति का दर्शन कराता है। कार्यक्रम के अंत में संगीतमय नाट्य माटी के महतारी की प्रस्तुति दी गई। जिसे दर्शकों ने खुब आनंद लिया। कलाकारों का सम्मान स्थानीय जनपतिनिधियों ने स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया। कार्यक्रम समन्वयक पुरुषोत्तम चन्द्राकर और कार्यक्रम का संचालन निरंजन साहू ने किया।