ये दुनिया एक मेला ये संगी जिहाँ माया के मीना बाजार हे|

मेला—-(भाग-२)
——-///—///—-

ये दुनिया एक मेला ये संगी
जिहाँ माया के मीना बाजार हे|
कतको आथे कतको जाथे
गिनती म लाखों हजार हे||

ऊपर वाला ह जादुगर ये,
कठपुतली कस नचावत हे|
अपन रंग म ये दुनिया ल,
आनी बानी के सजावत हे||
मस्ती कर ले ग मेला सजे हे,
बस दिन गिनती के चार हे–

ये दुनिया के मेला म भाई,
मिलना बिछुड़ना लगे रीथे|
कतको ह अंजान मिलहि,
त कतको झन ह सगे रीथे||
घाटा-मुनाफ़ा लगे रीथे,
इही तो दुनिया के व्यापार हे–

अजब मेला लगे हे संगी,
कोनों हाँसे,कोनो रोवत हे|
कतको के इंहा दिल मिलगे,
कतको पाके खोवत हे||
अजब मंच म गजब तमाशा,
देखावत कलाकार हे–

ग्यान,भक्ति अऊ उपासना ह,
त्रिवेणी कस धार जी|
धरम के नौका बना ले संगी,
करम के धर पतवार जी||
पुण्य के जिनिस बिसा ले संगी,
इंहा सजे हावय बाजार हे–
रचनाकार:– श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद,(छ.ग.)