छत्तीसगढ़ प्रांत जाँजगीर के उभरते हुए युवा कवि गौरव राठौर जी कि एक रचना आपके सामने प्रस्तुत है…

दलदल मे नीरज खिले खाता मन को

कुदरत के करिश्मे जो भाता मन को
दलदल मे नीरज खिले खाता मन को

हुनरबाज बच्चों का सपने न तोड़ो
खुद अपने बुनियाद से रिश्ता जोड़ो
गलत करने से सदा बचाता मन को
दलदल मे नीरज खिले खाता मन को

हिन्द मे बचे,वन्य पशु शिकारियों से
वन काटे,मिला हाथ अधिकारियों से
मिट्टी सने हाथ,पैर भाता मन को
दलदल मे नीरज खिले खाता मन को

जब न हो न्याय दानव मजे लूटेंगे
अब जनता के सबर के बाँध टूटेंगे
गाँव का माहौल सूकुन लाता मन को
दलदल मे नीरज खिले खाता मन को

– गौरव राठौर
जाँजगीर छ.ग.