”जटिल पूजा-पाठ के बजाय सरल स्वभाव, दया व मन की शुद्धि को ही भक्ति मानना”

 सुश्री सरोज कंसारी

”दया से बड़ी कोई पूजा नहीं होती,

सरल स्वभाव में बसती गंगा ईश की।

सेवा के लिए सदा प्रयत्न करो मनुज,

प्रार्थना समझकर सेवा को करते चलो।”

हमने यह अनुभव किया है कि कभी-कभी ईश्वर को मंदिर की मूर्तियों से कहीं अधिक किसी भूखे की थाली में, किसी के आँसू पोंछते हुए हाथों में और किसी के शांत-संतुष्ट चेहरे पर देखा जा सकता है। वास्तव में, असली पूजा बाहरी आडंबर या क्रिया नहीं, बल्कि अंतर्मन की एक पवित्र अवस्था है। क्रोध न करना, ईर्ष्या न करना, सदा सच बोलना, छोटों से प्रेम करना, सबका सम्मान करना और सबके कल्याण की कामना करना—यही वह वास्तविक ‘पूजा’ है, जो हमें हर दिन करनी चाहिए। यदि मनुष्य अपने स्वभाव में मिठास रख ले, तो उसके आसपास का माहौल खुद-ब-खुद एक मंदिर जैसा पवित्र हो जाता है। यही वास्तविकता है। हम अपने गुस्से पर काबू रखना सीख लें। ईश्वर तो हमारा साफ दिल देखता है और उसी से प्रसन्न हो जाता है। हमसे कभी किसी का दिल न दुखे। हम जितना हो सके, दयालुता के छोटे-छोटे कार्य करें जिससे हमें खुशी मिले।

हमारा स्वभाव सरल बना रहे और हमारी दयालुता की भावना जागृत रहे, यही तो जीवन में सबसे आवश्यक है। वाणी में हमारी सदा मधुरता रहे। मानवता की सेवा ही जिनका जीवन-उद्देश्य होता है, वे आत्म-संतोष की चिंता किए बिना निरंतर कर्म में लगे रहते हैं। संतकवि कबीरदास भी कहते हैं – “माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।” अर्थात माला जपने से पहले मन को जपना आवश्यक है। रामभक्त कवि तुलसीदास ने भी कहा “परहित सरिस धर्म नहिं भाई” – औरों का भला करना ही सबसे बड़ा धर्म है। हमारे ऋषि-मुनियों ने भी कर्मकांड से अधिक चरित्र को महत्व दिया। आज भागदौड़ की ज़िन्दगी में हमारे पास मंदिर जाने का समय होना चाहिए। किसी की मदद करने का 2 मिनट तो है ही। रास्ते में किसी बुजुर्ग को सड़क पार करा देना, घर आकर परिवार से प्रेम से बात करना – यही 21वीं सदी की पूजा है। दिखावे वाली भक्ति से अच्छा है, बिना बताए किया गया एक अच्छा काम।

जब हम दया, सद्भाव व करुणा के भाव से जीते हैं तो हमारा तनाव कम रहता है, बीमारियां दूर रहती हैं और मन में शांति बनी रहती है। सरल स्वभाव और शुद्ध मन केवल आध्यात्मिक ही नहीं, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक होता है। भक्ति केवल मंदिर की परिक्रमा लगाना या घंटों तक आसन लगाकर बैठना नहीं होता। सच्ची भक्ति तो हमारा मन निर्मल होना और हमारी वाणी में मधुरता आना ही है। हमारे हाथ दूसरों की सेवा के लिए स्वतः उठने लगें। जब हम किसी भूखे को भोजन कराते हैं, किसी निराश को हौसला देते हैं, किसी के दुःख में साथ खड़े होते हैं, तो समझिए हमने ईश्वर की सबसे बड़ी आरती कर ली। दिखावे और आडंबर से भरी पूजा कुछ समय के लिए मन को शांत कर सकती है, किन्तु स्थायी शांति तो सरल स्वभाव और करुणा से ही मिलती है।आज समाज को बड़े-बड़े यज्ञों की नहीं, बल्कि छोटे-छोटे मानवीय कार्यों की बहुत आवश्यकता है। मदद करें और अपने क्रोध पर संयम रखें — तो हमारा पूरा जीवन ही एक पूजा बन जाएगा। ईश्वर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में नहीं, उन स्थानों पर बसता है जहाँ सद्भावना है, दया है और करुणा है। इसलिए हमें यह समझना होगा कि कर्मकांड का बोझ ढोने से अच्छा है चरित्र को सुंदर बनाकर रखें; क्योंकि अंत में ईश्वर हमारे कर्म नहीं देखता, हमारे भाव देखता है और भाव तभी शुद्ध रहेंगे जब मन शुद्ध रहेगा। जब हमारी भावना की मधुरता बनी रहती है, तो हमारी मुस्कान हो अथवा प्रतिभा, निरन्तर सब कुछ खिलता रहता है।

सुश्री सरोज कंसारी 

लेखिका/कवयित्री/शिक्षिका 

अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,

गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, (छ.ग.)